धर्म के दर्शनक्षेण
सर्वोदय अहिंसा
= सर्वः सर्वत्र नन्दतु =
अंक - सातवाँ | सितम्बर 2017 (त्रैमासिक) | मूल्य - 20 रुपये प्रति
धर्म के दशलक्षण
- ब्रह्मचर्य धर्म
- क्षमा धर्म
- आर्किंचन्य धर्म
- मार्दव धर्म
- त्याग धर्म
- आर्जव धर्म
- तप धर्म
- शौच धर्म
- संयम धर्म
- सत्य धर्म
संपादक - प्रतीति जैन पाटीत
अंदर पढ़िए
जुलाई - सितम्बर - 2017
| क्र. सं. | विषय | पेज नं. |
|---|---|---|
| 1. | पहला कदम, अपनी और … | 1-2 |
| 2. | क्योंकि हम शाकाहारी हैं/अच्छे दिन आने वाले हैं | 3 |
| 3. | कितनी अजीब बात है न! | 5 |
| 4. | आपकी कलम से… (रश्मि जैन) | 6 |
| 5. | कर लो जिनवर की पूजन | 9-15 |
| 6. | Life Mantra | 18 |
| 7. | वाणी सर्वज्ञ की | 19 |
| 8. | क्योंकि हेल्थ भी जरूरी है… | 22-23 |
| 9. | आपकी कलम से… (डॉ. वीरसागर जैन) / आत्मकबुक | 26-29 |
| 10. | शब्द शक्ति / जानी-अनजानी बातें… | 30 |
| 11. | उलझे सवालों के सुलझे जवाब | 31 |
| 12. | बिखरे मोती | 32 |
साथ जुड़ें, साथ बढ़ें…
जैनस्टर्स पत्रिका को आगे बढ़ाने में आपका सहयोग भी आवश्यक है!
आइये जाने, आप कैसे हमसे जुड़ सकते हैं -
- आपके द्वारा प्रेषित लेख/कहानी/कविता आदि द्वारा
- जैनस्टर्स परिवार के सदस्य के रूप में
सदस्यता शुल्क : वार्षिक : 150/-
त्रिवार्षिक : 400/-
आजीवन : 1100/- (दस वर्ष) - पत्रिका के प्रकाशन में अर्थ सहयोग के द्वारा
सहयोग के हाथ
श्रीमती परिणाम जैन
विदिशा
श्रीमती आशा-शान्तिकुमार पाटीत, जयपुर
सज्जा के हाथ
श्री हरिओम वैष्णव, जयपुर
सदस्यता/सहयोग राशि ‘सर्वोदय अहिंसा’ के नाम से
ड्राफ्ट/मनीऑर्डर/चैक द्वारा भेज सकते हैं।
पंजाब नेशनल बैंक, खाता संख्या - 0247000101256826
IFS Code : PUNB0024700
संपादकीय
जुलाई-सितम्बर-2017
पहला कदम, अपनी और…
जय-जिनेन्द्र जैनस्टर्स!
Now, this is the age of smartphones. आजकल अक्सर ये बात सुनने में आ ही जाती है और कई बार तो हम खुद यह महसूस करते हैं कि स्मार्ट फोन के बिना हमारी लाइफ असंभव-सी लगती है। कहीं पढ़ा था -
बदलती दुनिया का ऐसा असर होने लगा है।
कि आदमी पागल और फोन स्मार्ट होने लगा है।।
हम जिसके मालिक थे, जब उसी के गुलाम बन गए
तो आदमी का पागल हो जाना वाजिब भी है। आज हम पूरी तरह से स्मार्ट फोन पर
निर्भर हो गए हैं कि उसके बिना एक पल भी बिताना मुश्किल-सा लगता है और इसे
ही Dependence Syndrome की बीमारी भी कह सकते हैं।
यह भी कितनी अजीब बात है न! कि जिस आदमी ने अपनी स्मार्टनेस से
स्मार्ट फोन को बनाया, उसी की स्मार्टनेस में वह इतना खो गया कि वह
अपनी स्मार्टनेस भूल गया।
पर सुबह के भूले हुए भी घर आ सकते हैं
और इसके लिए करना कुछ नहीं होगा। बस, जो
स्मार्टनेस हम उस फोन में ढूंढते हैं, वह स्मार्टनेस
हमें स्वयं में खोजनी होगी। जैसे स्मार्ट फोन बिना
operating system के नहीं चल सकते; उसी
प्रकार हमारे शरीर का operating system भी
हमारा आत्मा है, जिसके बिना हमारा शरीर नहीं
चल सकता।
जैसे स्मार्टफोन में अलग-अलग प्रकार के
एप्स के हम कायल होते हैं तो हमारे अंदर भी दश
धर्म के रूप में एप्स हैं, जिन्हें अगर हम Updated
रखें तो हमारी स्मार्टनेस कभी कम नहीं होगी।
जैसे फोन में एंटी-वायरस की सहायता से
हम उसे सुरक्षित रखते हैं, उसीप्रकार ये धर्म रूपी
एप्स भी पाप और कषाय रूपी वायरस से हमारे आत्मा
को बचा कर रखते हैं।
जुलाई-सितम्बर-2017
जैसे Whatsapp और Facebook जैसे social networking sites के द्वारा हम दुनिया भर के लोगों से जुड़ सकते हैं; धर्म रूपी एम से हम कभी-कभी अपनी आत्मा से जुड़ सकते हैं। ध्यान देने वाली बात ये है कि जैसे फोन को समय-समय पर चार्ज भी करना पड़ता है; उसी प्रकार दशारक्षण पर्व, अष्टाव्हिनका पर्व, अष्टमी-चतुर्दशी पर्व के रूप में हम भी अपने आत्मा को समय-समय पर चार्ज कर सकते हैं। जैसे स्मार्टफोन में इंटरनेट या अलग-अलग एप्स के द्वारा हम कभी भी कुछ भी सीख सकते हैं, वैसे ही हम भी जिनवाणी से आत्मा से संबंधित कुछ भी सीख सकते हैं।
तो बस अब स्मार्ट फोन की स्मार्टनेस को भूलिये और अपनी स्मार्टनेस को पहचानिये; क्योंकि हमारी स्मार्टनेस कहीं से भी स्मार्टफोन से कम नहीं है। स्मार्टफोन के ज्यादा प्रयोग करने के और social networking sites के ज्यादा प्रयोग के तो side effects भी हैं, लेकिन हम चाहे दश धर्म रूपी एम का चाहे कितना भी प्रयोग कर लें, पर उसके कोई side effects नहीं हैं; बल्कि इनका जितना ज्यादा प्रयोग होगा, उतना ज्यादा फायदा होगा।
तो देर किस बात की है! सौदा बुरा नहीं है!!
- प्रतीति जैन
गुरु-वाणी के पर्व का लक्षण
पद्मनन्दी पंचविंशतिका में समागत दश धर्म के स्वरूप पर पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के मंगल प्रवचन ‘दश धर्म प्रवचन’ में से धर्म और धर्म के स्वरूप को समझाते हुए अंशों को यहाँ संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है, जो कि पण्डित देवेन्द्रजी बिजौलिया द्वारा संपादित एवं तीर्थधाम मंगलायतन से प्रकाशित हैं; मूलतः पठनीय है।
वस्तुतः दश दिनों को पर्व कहना तो उपचार है; आत्मस्वभाव की प्रतीतिपूर्वक चारित्रधर्म की दश प्रकार से आराधना करना ही साधक जीव का सच्चा पर्व है। पर्व अर्थात् आराधना। उस आराधना का आरोप करके अमुक दिन को ‘पर्व’ कहना व्यवहार है, किन्तु जो आत्मा अपने में आराधक भाव प्रकट करता है, उसके लिए व्यवहार से दिन को पर्व कहा जाता है। जिसे आत्मा का भान नहीं है, उसके अपने में ही पर्व नहीं है, तब फिर दिन में भी किसका उपचार किया जायेगा?
जुलाई-सितम्बर-2017
क्योंकि हम शाकाहारी हैं
Original letter from the company confirming use of GELATIN Non-Veg in products
TO: Our Valued Customer
SUBJECT: Gelatin in Kellogg’s® Specialty Channels Products
Thank you for your inquiry regarding the type of gelatin used in Kellogg’s® Specialty Channels Products. The type of gelatin currently used in our products is outlined below. Product information is subject to change without notice.
Pork gelatin is used in Kellogg’s® Disney Frozen cereal and in all varieties of Kellogg’s® Rice Krispies Treats® bars, including Kellogg’s® Rice Krispies Treats® made with Whole Grain bars.
Beef gelatin is used in Pop-Tarts® Toaster Pastries. Because the gelatin is used in the icing, our unfrosted varieties do not contain any gelatin. However, it should be noted they are not certified Kosher.
Beef gelatin is also used in Kellogg’s® Frosted Mini Wheats® cereal, Kellogg’s® Mini Wheats Little Bites® cereal, and Kellogg’s® Rice Krispies Treats® cereal.
Beef or pork gelatin may be used in Kellogg’s® fruit flavored snacks.
We hope this provides you with the information you need to make food choices appropriate for your menu.
Regards,
Julia Jursinas
Julia M. Jursinas, MS
Sr. Director, Nutrition Labeling & Regulatory Compliance
Kellogg Company
अच्छा दिन आने वाले हैं -
महावीर निर्वाणोत्सव (दीपावली) 19 अक्टूबर, 2017
कार्तिक कृष्ण अमावस्या, वीर निर्वाण संवत 2544
अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के मोक्ष प्राप्ति की प्रसन्नता में दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। साथ ही इसी दिन से वीर निर्वाण संवत का प्रचलन भी शुरू हुआ, जो वर्तमान प्रचलित संवतों में सर्वाधिक प्राचीन है। इसी दिन भगवान महावीर के प्रमुख गणधर गौतमस्वामी को भी केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
बाहरी चकाचौंध और बनावट से दीपावली मनाने के बजाय यदि हम भगवान महावीर के बताए गए सिद्धांतों के अनुसार ही दीपावली मनाएँ तो वही सही मायने में भगवान महावीर की मोक्ष-प्राप्ति की प्रसन्नता को व्यक्त करना होगा।
जुलाई-सितम्बर-2017
क्षमा धर्म Anti-virus
क्षमा का anti-virus हमारे operating system को cool down रखता है और क्रोध virus से बचाता है।
स्वामी विवेकानन्द जी के रहन-सहन में बहुत सादगी थी। उनकी सादी वेश-भूषा से किसी को भी पता लग सकता था कि ये विद्वान हैं। एक बार वे किसी यात्रा पर जा रहे थे। जिस रेल के डिब्बे में वे बैठे थे, उसी में दो अंग्रेज भी थे। वे अंग्रेज साधु-संतों से बड़ी घृणा करते थे। इसी कारण वे रास्ते भर साधुओं की निंदा करते रहे। उन्होंने सोचा - यहाँ के साधु लोग पढ़े-लिखे नहीं होते हैं, वे अपनी भाषा को नहीं समझते हैं। वे दिल खोलकर साधुओं के प्रति अपमान-जनित शब्दों का प्रयोग करते रहे। खासकर वे बुराई कर रहे थे - स्वामी विवेकानन्द की। गर्मी के दिन थे। उन दोनों को प्यास लग गई। अंग्रेज ही में परस्पर बातचीत की। गला सूख रहा है। अगले स्टेशन पर पानी पीना है। स्वामी जी उन दोनों की बातें चुपचाप सुन रहे थे।
स्टेशन आया। गाड़ी रूकी। स्वामी जी दरवाजे पर खड़े हुए थे। पानी पिलाने वाले आदमी को पुकारा। जब वह निकट पहुँचा तो उन्होंने अंग्रेजों की ओर संकेत करते हुए कहा - इन्हें प्यास लग रही है, पानी पिलाओ। अंग्रेजों ने जब ऐसा सद्व्यवहार देखा तो लज्जा से उनके सिर झुक गए। उन्होंने मन में सोचा, यह व्यक्ति कौन है? इसके दिल में बड़ी सहृदयता है। यह तो अंग्रेजी भी जानता है। तब तो वे और भी अधिक शरमाये और उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करने लगे - ये महात्मा कितने उदार हैं! कितने सहनशील हैं! हमने इन्हें इतनी गालियाँ दीं, पर ये बिलकुल भी नाराज नहीं हुए, उग्र नहीं हुए; प्रत्युत हमारे लिए पानी की व्यवस्था की। धन्य है इनकी सहिष्णुता और उदारता को! ऐसे महापुरुष ही विश्व का कल्याण करेंगे। दोनों व्यक्ति अपनी गलती पर बहुत पछताए।
अप्रिय वचनों और गालियों को सुनकर जो गुस्सा नहीं करता है, वही मानव विश्व का ताज बन सकता है। गालियों को समता भाव से सहन करनेवाले के सामने दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं।
जैनधर्म वही, सोच नई!
• जब जैनधर्म को पढ़ेंगे यंगस्टर्स, तभी तो बनेंगे जैनस्टर्स।
• यदि आप भी महान जिनशासन के मर्म को समझना चाहते हैं,
• किताबों के पन्नों से उठकर जैनधर्म को
अपनी लाइफ स्टाइल में लाना चाहते हैं,
• यदि आप भी अपने जैन होने पर गर्व करना चाहते हैं,
• यदि आप भी जैनस्टर्स बनना चाहते हैं
तो आज ही जैनस्टर्स परिवार के सदस्य बनिये।
जुलाई-सितम्बर-2017
मार्दव धर्म Anti-virus
मार्दव का anti-virus हमें अभिमान नामक खतरनाक virus से बचाता है।
अब्राहम लिंकन एक बार अपने गाँव के नजदीक एक जन-सभा को संबोधित कर रहे थे। भाषण के बीच एक महिला खड़ी होकर बोली - अरे, यह राष्ट्रपति है! यह तो हमारे गाँव के मोची का लड़का है।
अपने प्रति ये अपमान-जनक शब्द सुनकर लिंकन ने बड़े ही विनम्र शब्दों में उस महिला से कहा - मैडम! आपने बहुत अच्छा किया, जो उपस्थित जनता से मेरा यथार्थ परिचय करा दिया। मैं वही मोची का बेटा हूँ।
क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकता हूँ?
अवश्य, उस महिला ने कहा।
लिंकन ने पूछा - क्या आप यह बताने का कष्ट करेंगी कि मेरे पिताजी ने आपके जूते आदि तो ठीक तरह से मरम्मत किए थे न? आपको उनके कार्य में कोई शिकायत तो नहीं मिली।
उस महिला ने सफाई देते हुए कहा - नहीं-नहीं! उनके कार्य में कोई शिकायत नहीं मिली। वे अपना काम बड़ी अच्छी तरह करते थे।
तब लिंकन ने उत्तर दिया - मैडम! जिस प्रकार मेरे मोची पिता ने अपने कार्य में आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दिया, उसी प्रकार मैं भी आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि आपने मुझे राष्ट्रपति के रूप में सेवा करने का जो मौका दिया है, उसे मैं बड़ी ही कुशलता से करूँगा और यह मेरी कोशिश रहेगी कि मेरे काम में आपको कोई शिकायत का मौका न मिले।
कितनी अजीब बात है न!
- बड़े अजीब से आजकल इस दुनिया के मेले हैं, दिखती तो भीड़ है पर चलते सब अकेले हैं।
- विज्ञान कहता है कि जीभ पर लगी चोट सबसे पहले ठीक होती है, पर ज्ञान कहता है कि जीभ से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती।
- जिस समय आप खुद को खुश करने के लिए किसी का अपमान कर रहे होते हैं… दरअसल आप उस समय अपना सम्मान खो रहे होते हैं।
- न जाने जिंदगी का ये कैसा दौर है… इंसान खामोश है, फेसबुक और वाट्सएप पर बधाइयों का शोर है।
जुलाई-सितम्बर-2017
आपकी कलम से..
पर में अपनापन ही तो मिथ्यात्व है
फेसबुक पर एक फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करते ही उसके सभी दोस्त तथा दोस्तों के भी दोस्त हमें रिक्वेस्ट भेज सकते हैं और हमारी पोस्ट देख सकते हैं अर्थात् हमारा सभी से परोक्ष नाता जुड़ जाता है। हम भी उनकी पोस्ट कमेंट्स पढ़ सकते हैं। उनमें अच्छे-बुरे - दोनों तरह के स्वभाव वाले लोग होते हैं। लेकिन हम तो सबसे भिन्न अपनी सत्ता में हैं।
इसी प्रकार जगत में एक परमाणु को भी अपना मानते ही अनंत परमाणुओं के साथ हमारा संबंध जुड़ जाता है और समय-समय पर अनंत परमाणु हमारे साथ बंध को प्राप्त होते रहते हैं। और हमारा वह एक परमाणु में अपनत्व का भाव ही मिथ्यात्व है, जिसके पीछे अनंत परमाणुओं की सेना चली आती है। जैसे एक पति को अपना मानते ही उसके पूरे खानदान के साथ हमारा संबंध हो जाता है। जिनमें अच्छे-बुरे दोस्तों की तरह ही शुभ-अशुभ - दोनों तरह के परिणाम होते हैं, लेकिन हम तो उन सबसे भिन्न अपने ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव में (जानने-देखने रूप सत्ता में ही) रहते हैं।
यदि हम सैटिंग्स में जाकर अपनी पिक्चर्स आदि को पब्लिक से हटाकर फ्रेंड्स पर सेट कर दें तो सिर्फ हमारे फ्रेंड्स ही हमारी पोस्ट देख सकते हैं, इसी प्रकार चौथे गुणस्थान में परद्रव्य के प्रति अहंपने का अभिप्राय समाप्त हो जाता है, तब वहाँ अनंतानूबंधी का अभाव होकर केवल चारित्रमोह जनित कषायें रह जाती हैं। अर्थात् अनंत संसार से बाँधने वाली कषाय उस जीव को नहीं रहती। इसलिए शीघ्र ही वह स्वस्वरूप में हमेशा के लिए स्थिर हो कर जनम-मरण से मुक्त हो जाता है।
अतः हे मम प्रियात्मन्! पर में अपनपने की इस मान्यता को शीघ्र छोड़ो।
- रश्मि जैन, फरीदाबाद
FAITH
Once all villagers decided to pray for rain. On the day of prayer everybody gathered but, only one boy came with an umbrella.
जुलाई-सितम्बर-2017
आर्जव धर्म Anti-virus
यह anti-virus हमारे system के स्वभाव से विपरीत होने वाले कार्य को रोकता है और स्वभाव के अनुसार कार्य कराता है।
लंदन में शेक्सपीयर का लोकप्रिय नाटक चल रहा था। वहाँ के धर्म-पुरोहित का मन उत्सुकता से भर गया। वह नाटक देखना चाहता था, पर उसने अपने उपदेश में नाटक देखने वालों की कटु आलोचना की थी और उसे बुरा बताया था। उसे एक उपाय सूझा।
उसने नाटक थियेटर के मैनेजर के नाम एक पत्र लिखते हुए उनसे अनुरोध किया -
मैं आपका नाटक देखना चाहता हूँ, पर वहाँ कोई ऐसी व्यवस्था है क्या, जिससे मैं नाटक देख सकूँ, पर दर्शक मुझे नहीं देख सकें।
मैनेजर ने उत्तर लिखा - आप यहाँ अवश्य आइये। आप जैसे लोगों के लिए पीछे चोर दरवाजा है और बैठने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था है। वहाँ बैठकर आप दर्शकों की आँखों से बच सकते हैं, पर परमात्मा की नजरों से आप बच सकें - ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ नहीं है।
गुरु-वाणी में धर्म का स्वरूप
सर्वज्ञ देव द्वारा उपदेशित धर्म का मूल सम्यग्दर्शन की परम्परा से जो जिनमत प्रवर्तमान है, उसमें धर्म के स्वरूप का यथार्थ निरूपण है तथा निश्चय और व्यवहार - ऐसे दो प्रकार से धर्म का कथन किया है।
धर्म की प्ररूपणा चार प्रकार से है -
- वस्तु के स्वभाव रूप धर्म 2. उत्तम क्षमा आदिलक्षण धर्म
- सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप धर्म और 4. जीव-रक्षा रूप धर्म।
यदि वहाँ निश्चय से विचार किया जाए तो इन चारों प्रकारों में शुद्ध चेतनास्वरूप धर्म एक ही प्रकार का है।
परमार्थ अर्थात् निश्चय धर्म या सच्चा धर्म तो एक ही प्रकार का है, फिर उसे जीवदया कहो अथवा वस्तुस्वभाव कहो; उसमें मात्र शुद्ध चेतना परिणाम ही धर्म है। ‘शुद्ध चेतना को धर्म कहते हैं और कभी-कभी शुभभाव को भी धर्म कहते हैं’ - ऐसा स्वरूप निश्चय धर्म का नहीं है। निश्चय धर्म तो एक ही प्रकार का है।
शौच धर्म Anti-virus
यह anti-virus हमारे system को बाहर से ही नहीं, अन्दर से भी clean कर देता है।
परिवार में माँ ने अपने बेटे का विवाह किया, बहू घर में आयी। माँ जी बहू को पाकर बहुत प्रसन्न थी। वे बहू को बहुत प्यार करती थीं। एक दिन वे बहू से बोलीं - बेटा! दही जमाना है। शाम होने के पहले भगौनी को साफ़ कर लो। माँज कर उसमें जामन डाल देना और जो दूध रखा है, वह उसमें मिला देना। सुबह-सुबह घी तैयार करना है।
पुत्रवधू ने हाँ कहा कर भगौनी उठाई और उसे उसने रगड़कर माँजा। भगौनी चमकने लगी, पर बाहर से। इसके बाद उसने भगौनी में सास के कहे अनुसार जामन डाला और दूध लाकर उसमें मिलाया तथा ढँककर उसे रख दिया।
सवेरा हुआ। सास ने भगौनी का ढक्कन हटाया। वह भगौनी को देखकर दंग रह गयी। दूध भगौनी में जमा नहीं, फट अवश्य गया था।
सास ने बहू से पूछा - बेटा! बात क्या हुई? दूध कैसे फट गया? बर्तन ठीक से माँजा था कि नहीं?
बहू ने कहा - माँ जी! भगौनी खूब रगड़कर माँजी थी। देखो माँ जी! भगौनी अब भी चमक रही है। सास ने देखा कि भगौनी ऊपर से चमक तो रही है, पर भीतरी भाग लगता है कि नहीं माँजा गया। उन्होंने बहू को अपने पास बुलाया। भगौनी बहू को दिखाई और कहा - बेटा! लगता है, आपने भगौनी का भीतरी भाग नहीं माँजा, बाहरी भाग ही माँजा है।
बहू ने अपनी स्वीकृति देते हुए कहा - माँ जी! आप ठीक कहती हैं। मैंने बाहरी भाग तो चमका दिया और भीतरी भाग माँजना ही भूल गयी।
सास ने कहा - बेटा! आपकी भूल से दूध भी चला गया और दही भी नहीं मिला। घी भी नहीं बन पाया। अब भविष्य में बर्तन बाहर-भीतर दोनों ओर स्वच्छ रखा करो। ध्यान रहे! बहू ने अपनी गलती स्वीकार की और सास से क्षमा-याचना करते हुए उसने कहा कि भविष्य में ऐसा कभी नहीं करूँगी।
आय यह है कि जिनवाणी के माध्यम से पढ़कर, समझकर अपने आत्मा को जो बाहर-भीतर से सब तरह से रत्नत्रय के द्वारा संस्कारित करता है, माँजता है; वही अपने शुद्ध परमात्मस्वरूप को प्राप्त कर लेता है। केवल बाह्य शरीर को माँजने वाला कभी भी आत्मस्वरूप की उपलब्धि नहीं कर सकता।
कर लो जिनवर की पूजन
दशलक्षण पर्व के अवसर पर प्रतिदिन प्रस्तुत पूजन की जाती है, परंतु इसका असली भावार्थ प्रायः हमें ज्ञात नहीं होता; अतः इस अंक में पूजन एवं जयमाला का अर्थ दिया जा रहा है, ताकि हम सिर्फ़ शब्दों को ही न पढ़कर भाव सहित धर्म के मर्म को समझें।
पंडित द्यानतराय जी द्वारा रचित
दशलक्षण धर्म पूजन
का सरल अर्थ
स्थापना
उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव - ये भाव कहे हैं। उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग - ये उपाधूत हैं। उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य - ये सभी दश धर्म मिलकर धर्म के सार हैं। जो इन्हें अपनी आत्मा में स्वभाव रूप ग्रहण करता है, वह चारों गतियों के दुखों से निकलकर मुक्ति को प्राप्त करने वाले मार्ग को प्राप्त कर लेता है।
अष्टक
जल - हिमवन पर्वत से निकलने वाली गंगा-सिंधु की धारा मुनियों के मन के समान निर्मल, शीतल, सुगंधित है; उसी प्रकार संसार ताप को निवारण करने वाले ऐसे दशलक्षण धर्म हैं, इसलिए उनको हमेशा पूजता हूँ।।1।।
चंदन - चंदन-केसर आदि घिसने पर दसों दिशाओं में सुगंध फैल जाती है, उसी प्रकार संसार-ताप का निवारण करने वाले ये दश धर्म उत्तम क्षमा आदि हैं। इसलिए मैं उनको हमेशा पूजता हूँ; उसी प्रकार संसार ताप…।।2।।
अक्षत - मलरहित, अखंड चंद्रमा के समान सफ़ेद चावल चढ़ाकर अक्षय पद की प्राप्ति की भावना भाता हूँ; उसी प्रकार संसार ताप…।।3।।
पुष्प - नाना प्रकार के फूलों की सुगंध से ऊर्ध्व लोक तक सुगंधित हो गया है; उसी प्रकार संसार ताप…।।4।।
नैवेद्य - नाना प्रकार के उत्तम मनोहारी व्यंजन छहों रसों से संयुक्त हैं; उसी प्रकार संसार ताप…।।5।।
दीप - कपूर की बाती वाले दीपक की ज्योति अति मनोहर लगती है; उसी प्रकार संसार ताप…।।6।।
धूप - जिस अगर आदि चंदन की धूप की सुगंध विस्तार से सभी जगह फैल रही है। ऐसी धूप से संसार-ताप के निवारण हेतु दशलक्षण धर्म की पूजा करता हूँ।।7।।
फल - प्राण, नेत्र, मन को आकर्षित करने वाला बहुत जाति के फल हैं; उसी प्रकार संसार ताप…।।8।।
अर्घ्य - कवि द्यानतराय जी कहते हैं कि आठों द्रव्यों को एक साथ मिलाकर अत्याधिक उत्साह पूर्वक संसार-ताप का निवारण करने के लिए दशलक्षण धर्म की मैं पूजन करता हूँ।।9।।
उत्तम क्षमा धर्म
पीई दुष्ट अनेक … सौवरा।।1।।
अनेक प्रकार बांधकर, पीटकर या नाना प्रकार से दुष्टों के द्वारा कष्ट दिए जाने पर भी सज्जन क्रोध नहीं करते हैं एवं क्षमा रूपी विवेक को धारण करते हैं।
हे भाई! उत्तम क्षमा को धारण करने से इस भव यश में तथा दूसरे भव में सुख प्राप्त होता है। यदि कोई गाली देता है तो मन में खेद-शोक नहीं लाना चाहिए। यदि अज्ञानी/मूर्ख लोग अपने गुणों को अवगुण (दोष) भी कहें, हमारी वस्तु भी छीन लें; इतना ही नहीं, कई प्रकार से सताये जाने पर, बाँधे-मारे जाने पर, घर से निकाल देने पर, शरीर को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी वैर (दुश्मनी) को धारण नहीं करना चाहिए।
हे जीव! जो पूर्व जन्म में खोटे (पाप) कर्म किए तो सहन करने (भोगने) ही पड़ेंगे। हे जीव! क्रोध रूपी अग्नि को समता रूपी शीतल जल लेकर बुझाना चाहिए। यही उत्तम क्षमा धर्म है।
उत्तम मार्दव धर्म
मान महा विषरूप … पावै उदा।।2।।
मान (अहंकार) हलाहल विष के समान है। यह मान, नीच गतियों को करने वाला है अर्थात् मान के कारण खोटी गतियों में जाना पड़ता है। मार्दव (कोमलता) रूपी अमृत को धारण करने वाला जीव हमेशा सुख पाता है। उत्तम मार्दव को गुण (स्वाभाविक धर्म) मन से माना जाता है और मान करने वाले का कौन-सा ठिकाना है? क्योंकि अनादिकाल से निगोद में रहा, वहाँ से आकर वनस्पति काय का जीव हुआ तो दमरी (दमड़ी) रुकन (मुद्रा की सबसे छोटी इकाई) के भाव बिका और कभी-कभी
जुलाई-सितम्बर-2017
Jainster’s
बिना मूल्य के ही बिका। तीव्र पुण्य के उदय से देव हुआ और वहाँ से चलकर फिर एक इंद्रिय हुआ। उत्तम पर्याय के बाद चंडाल हो गया और राजा भी कीड़ों में उत्पन्न हुआ।
हे जीव! जीवन, यौवन और धन-दौलत का क्या घमंड करना! ये सब जल के बुलबुले के समान क्षणभर में नष्ट होने वाले हैं। जो बहुत गुणवान है, बड़े हैं; उन महापुरुषों की विनय करनी चाहिए, जिससे ज्ञान प्राप्त होता है।
उत्तम आर्जव धर्म
कपट न कीजै
…
नहीं देखता।।3।।
कोई भी छल-कपट, मायाचारी मत करो; क्योंकि ऐसा करने वालों अर्थात् चोरों आदि के नगर कभी नहीं बसे (बने)। तात्पर्य यह है कि छल-कपट-चोरी आदि करने से नगरों में नहीं रह पाये। और जो सरल स्वभाव वाले होते हैं, उनके घर में बहुत संपत्ति होती है।
उत्तम आर्जव धर्म परंपरा से जीव का सरल स्वभाव कहा गया है। और थोड़ा-सा भी छल-कपट बहुत-से दुख, कष्ट देने वाला होता है। इसलिए उससे बचने के लिए ही मन में जो हो, सो शब्दों में कहना चाहिए, जो शब्दों में कहा जाये, उसे शरीर से भी करना चाहिए।
इस प्रकार अपने तीनों योगों (मन-वचन-काय) को सरल/एक जैसा कीजिए। जैसे स्वच्छ दर्पण में जैसा हमारा मुख होता है, वैसा ही दिखता है। छल-कपट से प्रीति करना अज्ञानों से प्रीति करने के समान है। कोई भी अधिक मायाचारी करके धन-संपत्ति प्राप्त नहीं कर सकता, अपितु ऐसा करने से अधिक कर्मों का बंध होता है। छल-कपट करते समय वह कर्मबंध का ध्यान नहीं करता है। जैसे बिल्ली दूध पीते समय भय का त्याग करती है, वह ध्यान नहीं रखती कि पीछे से मार पड़ेगी; उसी प्रकार छल-कपट करने वाला भी कर्म-बंध एवं आपत्ति का ध्यान नहीं रखता है।
उत्तम शौच धर्म
धरि हिरदै
…
साधु लहै।।4।।
हृदय में संतोष धारण करके, शरीर से तपस्या करनी चाहिए। निर्दोष शौच धर्म ही सर्व जगत में प्रसिद्ध है। आशा अर्थात् इच्छा रूपी नाग महादुख को देने वाला है। संतोष को धारण करने वाले प्राणी सुख प्राप्त करते हैं। यह जीव शील, जप, तप, ज्ञान, ध्यान के प्रभाव से पवित्रता प्राप्त करता है। गंगा-यमुना आदि नदियों एवं समुद्रों में
जुलाई-सितम्बर-2017
Jainster’s
निरंतर नहाने से भी पवित्रता नहीं होती; क्योंकि इस शरीर का स्वभाव ही अपवित्र (अशुचि) है। यह शरीर ऊपर से तो मल रहित पवित्र दिखाई देता है, परंतु इसके भीतर मल भरा हुआ है। तब ऐसे शरीर को किस प्रकार से पवित्र कहा जाए। जिनका शरीर तो बहुत मैला है, परंतु जो उत्तम गुणों के भंडार है। ऐसे महाव्रती साधु ही इस उत्तम शौच गुण को प्राप्त करते हैं।
उत्तम सत्य धर्म
कठिन वचन
…
नारद गया।।5।।
कठिन (कठोर) वचन कभी नहीं बोलना चाहिए। दूसरों की निंदा और झूठ वचनों का त्याग करो। सत्यरूपी जवाहर रत्न का उपयोग करने वाला और सत्य बोलने वाले प्राणी, संसार में सुखी रहता है। अतः उत्तम सत्य धर्म का पालन करना चाहिए और दूसरों के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। जगत में सच्चे-झूठे मनुष्यों का स्वरूप जानने वाले व्यक्ति, झूठ बोलने वाले अपने पुत्र पर भी विश्वास नहीं करते और सत्य बोलने वाले अन्य का विश्वास कर धन भी देते हैं। सच्चे गुणों या सत्य धर्म को ग्रहण करने से मुनिराजों और श्रावकों की प्रतिष्ठा (सम्मान) होती है। ऊँचे आसन पर बैठकर राजा वसु न्याय किया करता था और मात्र एक झूठ बोलने से नरक में चला गया तथा सत्य बोलने वाला नारद स्वर्ग गया।
उत्तम संयम धर्म
काय छहों
…
बीच में।।6।।
छह काय के जीवों की रक्षा और पाँच इंद्रियों एवं मन को वश में करना चाहिए। विषय-कषाय रूपी चोर बहुत घूम रहे हैं, इसलिए संयम रूपी रत्न सँभाल कर रखो। हे मेरे मन! उत्तम संयम धर्म को ग्रहण करो, जिसके कारण अनेकानेक भवों के पाप नष्ट हो जायेंगे। आलस्य को हरने वाला और सुख को देने वाला यह उत्तम संयम धर्म देव, नरक, तिर्यंच (पशु) गति में नहीं होता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति – ये पाँच स्थावर और त्रस – इन छह काय के जीवों की दया धारण कर स्पर्शन (त्वचा), रसना (जीभ), प्राण (नाक), चक्षु (आँख), कर्ण (कान) एवं मन को वश में करो। इस संयम के अभाव में जिनराज (तीर्थंकर) भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाए अर्थात् जब तक तीर्थंकर गृहस्थ अवस्था में थे, उन्होंने संयम अंगीकार नहीं किया था, तब तक वे मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सके थे।
इसलिए हे जीव! इस संयम को ग्रहण न करने के कारण से ही तुम संसार रूपी
कीचड़ में फँसे हो। हम निरंतर मृत्यु रूपी यमराज के मुख की ओर जा रहे हैं। इसलिए उत्तम संयम धर्म को एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए।
उत्तम तप धर्म
तप चाहै सुरराय
…
कलसा धरै।।7।।
उत्तम तप धर्म को देवों के राजा (इंद्र) भी चाहते हैं। यह तप कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए वज्र के समान है। ये बारह प्रकार के तप सुख को देने वाले हैं तो क्यों न उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार धारण करें। कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए उत्तम तप धर्म वज्र के समान सभी शास्त्रों में कहा है। यह जीव अनादि काल से निगोद में रहा है। वहाँ से निकलकर पृथ्वी आदि स्थावर एवं उसके बाद दो इंद्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय आदि हुआ; फिर तिर्यंच (पशु) का शरीर धारण किया। अब यह मनुष्य पर्याय बड़ी कठिनता से धारण की। उसमें भी उत्तम कुल, पूर्ण आयु, निरोगी शरीर, जिनवाणी का संयोग, तत्त्वज्ञान, आत्मचिंतन में उपयोग बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुआ। जो जीव महा कठिन विषय और कषाय का त्याग कर तप को आदर पूर्वक ग्रहण करते हैं, वे मनुष्य भव रूपी अलौकिक स्वर्ग घर पर, नीलमणि आदि रत्नमय कलश चढ़ाते हैं अर्थात् मनुष्य जन्म को सार्थक बनाते हैं।
उत्तम त्याग धर्म
दान चार प्रकार
…
बोध को।।8।।
दान चार प्रकार का है। ये चार संघ अर्थात् मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविका को देना चाहिए। धन, सम्पत्ति, वैभव, बिजली की चमक की तरह हैं। अतः दान देकर मनुष्य भव का लाभ ले लेना चाहिए।
समस्त संसार में उत्तम त्याग धर्म श्रेष्ठ कहा गया है। औषधिव-दान, शास्त्र-दान, अभय-दान, आहार-दान – ये तो व्यवहार त्याग के रूप में हैं। राग और द्वेष का निवारण करना (त्यागना) निश्चय त्याग है।
बुद्धिमान लोग दोनों दान (व्यवहार और निश्चय) करते हैं। कुएँ का पानी नहीं निकालने पर खराब हो जाता है और उससे अधिक बहता भी नहीं है तथा निकालने पर खराब नहीं होता एवं जितना निकालते हैं, उतना फिर से भर जाता है। उसी प्रकार घर में धन, वैभव की दान के अभाव में स्थिति बनती है। इसलिए धन-सम्पत्ति को अपने हाथ से दान देकर साथ में ले लीजिए। धन-वैभव खाने-पीने में खर्च करना तो बह जाने के
जुलाई-सितम्बर-2017
समान है, वह नष्ट हो जायेगा; लेकिन साथ रहने वाला नहीं है। धन्य है वे साधु, जो ज्ञानदान, अभयदान देने वाले हैं और राग-द्वेष इत्यादि विकारों का त्याग करने वाले हैं। दान के बिना श्रावक और साधु सम्यग्ज्ञान को प्राप्त नहीं करते।
उत्तम आकिंचन्य धर्म
परिग्रह चौबिस भेद…पर-उपगार साँ।।9।।
परिग्रह के चौबीस भेद होते हैं। उनका त्याग मुनिराज करते हैं और तृष्णा भाव को क्षय करते हैं। इसी प्रकार श्रावकों को भी धीरे-धीरे दोनों प्रकार के (अंतरंग और बहिरंग) परिग्रहों को कम करना चाहिए। उत्तम आकिंचन्य उत्कृष्ट गुण जानना चाहिए। परिग्रह की चिंता दुख देने वाली मानो। जिस प्रकार छोटी-सी फाँस लग जाने पर पूरे शरीर में कष्ट देती है, उसी प्रकार एक लँगोट्टी की इच्छा दुख देने वाली है। दिगंबर मुनि की मुद्रा को धारण किए बिना मनुष्य कभी समता और सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। वे मुनिराज धन्य हैं जो पर्वतों पर नग्न खड़े रहकर तप करते हैं, उनके चरणों की सुर-असुर आदि अर्चना करते हैं। घर में रहते हुए भी जो अपनी तृष्णा को घटाते हैं और संसार में अपनी रुचि नहीं रखते हैं, वे श्रावक भी धन्य हैं। बहुत धन-सम्पत्ति तो बुरी ही होती है, परंतु जो धन परोपकार में लगाता है, वह फिर भी श्रेष्ठ कहा गया है।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
शील बाढ़ नौ राख…पग धरा।।10।।
शील की रक्षा नौ बाड़ों को लगाकर करनी चाहिए (व्यवहार ब्रह्मचर्य) और अंतर में आत्मचिंतन करना चाहिए। (निश्चय ब्रह्मचर्य) निश्चय एवं व्यवहार ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के इच्छुक होकर मनुष्य जन्म सार्थक करना चाहिए। मन में ब्रह्मचर्य धारण कर माता, बहिन, पुत्री की पहचान करना चाहिए। वीरों के द्वारा होने वाली बाणों की वर्षा को यह जीव सहन कर लेता है, परंतु कुशील स्त्रियों के विकारी नेत्र रूपी बाण को सहन नहीं कर पाता। ऐसे काम रूपी रोग से पीड़ित स्त्री के अपवित्र शरीर में उसी प्रकार रति (प्रेम) करता है; जिस प्रकार श्मशान भूमि में सड़े हुए मृतक शरीर को कौआ प्रेमपूर्वक चोंच भरकर खाता है।
संसार में नारी को विष-बेल के समान कहा गया है, जिसका सभी मुनिराजों ने त्याग कर दिया है। यहाँ कवि ध्यानरायजी कहते हैं कि ये दश धर्म रूपी सीढ़ियाँ चढ़कर जीव मोक्ष रूपी महल में प्रवेश हो जाता है।
(स्त्रियों को विष-बेल कहने का अभिप्राय स्त्रियों के प्रति काम की इच्छा रखना है, बहिन अथवा माता के प्रति राग रखना नहीं है।)
जुलाई-सितम्बर-2017
जयमाला
दश लच्छन…सुख की राशि।
दशलक्षण धर्म की मैं हमेशा वंदना करता हूँ। ये मन के अनुकूल (मनवांछित) फल को देने वाले हैं। मैं दशधर्मों की आरती को कहता हूँ। हे भगवन! हम पर कृपा करें।
जिसके मन में उत्तम क्षमा होती है, उसके मन में अंतरंग एवं बहिरंग दोनों प्रकार के राग-द्वेष आदि विकारी भाव, आत्मा के अंदरूनी शत्रु और बाहरी शत्रु नहीं रहते हैं। उत्तम मार्दव धर्म, विनय गुण को प्रकाशित करके सम्यग्ज्ञान के नाना प्रकार के (आठ प्रकार) के भेदों का प्रकाश कराता है।।1।।
उत्तम आर्जव धर्म मायाचारी छल-कपट आदि को मिटाकर एवं खोटी गतियों से हटाकर उत्तम गतियों में उत्पन्न कराता है। मुख से जो कोई उत्तम सत्य वचन बोलता है, वह प्राणी संसार में घूमता नहीं है।।2।।
लोभ कषाय को दूर करने वाला उत्तम शौच धर्म है। संतोषी प्राणी गुणों के भंडारी होते हैं, जो ज्ञानीजन उत्तम संयम धर्म को धारण करते हैं, वे सुख-शांति को प्राप्त करके मनुष्य जन्म को सार्थक करते हैं।।3।।
जो उत्तम तप की इच्छा रहित होकर पालता है, वह मनुष्य कर्म रूपी शत्रुओं को नष्ट कर देता है और जो व्यक्ति उत्तम त्याग धर्म का पालन करते हैं, वे भोगभूमि और स्वर्ग के सुख को भोगकर मोक्ष-सुख को प्राप्त करते हैं।।4।।
जो उत्तम आकिंचन्य व्रत को धारण करते हैं, वे उत्कृष्ट सल्लेखना-समाधि को प्राप्त करते हैं तथा जो उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म को मन में धारण करते हैं, वे मनुष्य-देव पर्याय धारण करते हुए मुक्ति-फल को प्राप्त करते हैं।।5।।
दोहा - ये दशलक्षण धर्म, कर्मों की निर्जरा करते हैं और संसार रूपी पिंजरे को नष्ट करके अजर-अमर पद प्राप्त कराते हैं। ध्यानरायजी कहते हैं कि ये दशलक्षण धर्म अनंत सुख की प्राप्ति कराने वाले हैं।
गुरु-वाणी में उत्तम क्षमा
आत्मस्वरूप को समझकर, उसका बहुमान करना ही उत्तम क्षमा की आराधना का यथार्थ पर्व है। मेरा ज्ञानस्वभाव अंतरंग में सहज क्षमास्वरूप है; क्रोध की वृत्ति मुझमें है ही नहीं - इस प्रकार अपने स्वभाव और क्रोध के भेद्ज्ञान पूर्वक स्वत्व का एकाग्रता, सहज क्षमा है और वही धर्म है। जो आत्मा अपने में ऐसा क्षमाभाव प्रकट करता है, वही इस पर्व की यथार्थ आराधना करनेवाला है।
जुलाई-सितम्बर-2017
सत्य धर्म Anti-virus
यह anti-virus हमें झूठ के virus से बचाता है।
एक अंधा व्यक्ति एक बड़ी हथेली के बाहर बैठकर भीख माँग रहा था। उसने अपने पास एक छोटा-सा बोर्ड लगाया हुआ था। मैं अंधा हूँ, कृपया मेरी मदद करें।
दोपहर होने वाली थी और उसके बर्तन में कुछ ही सिक्के आए थे। तभी वहाँ से एक रचनाकार गुजरा। उसकी नजर अंधे भिखारी और उसके बोर्ड पर पड़ी। उसने बोर्ड पर लिखे हुए वाक्य को मिटाकर उस पर कुछ और लिखा, फिर कुछ सिक्के डालकर चला गया।
शाम को वह व्यक्ति दोबार वहाँ से लौटा। अब भिखारी के बर्तन में ढेर सारे सिक्के थे। भिखारी उसकी कदमों की आहट पहचान गया।
उसने उससे पूछा - तुमने बोर्ड पर क्या लिखा था?
कुछ खास नहीं। मैंने तुम्हारी ही बात को दूसरे तरीके से लिख दिया था। उस व्यक्ति ने जवाब दिया।
उस बोर्ड पर लिखा था - आज से वसंत शुरू हो गया है, लेकिन मैं देख नहीं सकता।
मात्र सत्य कहना ही अहेत नहीं है। सत्य को कहने का तरीका भी अहम होता है।
गुरु-वाणी में उत्तम मार्दव
गुरु-वाणी में उत्तम मार्दव - ज्ञानी अपने ज्ञायकस्वरूप में जागृत है। मैं मेरे स्वरूप में मान-अपमान की वृत्ति नहीं है; यह समस्त संसार इन्द्रजाल के समान और स्वप्नवत् है अर्थात् मेरे स्वभाव में समस्त जगत का अभाव है; जगत में किसी के साथ मेरा संबंध ही नहीं है - ऐसा जाननेवाले ज्ञानियों के मान कहाँ से होगा? अर्थात् नहीं होगा।
मुनि के तो मान की वृत्ति ही नहीं उठती, यह निरभिमानता है और ज्ञानी गृहस्थ के किसी मानादि की वृत्ति हो जाए तो भी वह उसका ज्ञाता ही है। उसे मानादि से भिन्न आत्मस्वरूप के श्रद्धा-ज्ञान की दृढ़ता होती है। मैं नित्य अबंध चैतन्यस्वभाव हूँ - ऐसे स्वभाव की प्रभुता के समक्ष ज्ञानी को अपूर्ण पर्याय की पामरता भासित होती है, उन्हें क्षणिक पर्याय का अभिमान नहीं होता। उनको ही स्वभाव के आश्रय से वीतराग भाव होने पर उत्तम मार्दव धर्म होता है।
संयम धर्म Anti-virus
यह anti-virus हममें नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी अन्य हानिकारक sites (इंद्रिय विषय-भोग) पर जाने से रोकता है और सावधान करता है।
किसी नगर में एक गुरुकुल संचालित था। अनेक छात्र आकर उसमें विद्याभ्यास कर रहे थे। इनमें कुछ छात्र ऐसे भी थे, जो गुरु के पास बहुत समय से पढ़ रहे थे और उनकी साधना भी चल रही थी। छात्र कुछ सीख रहे हैं कि नहीं, उन्हें विषय हृदंगम हो रहा है कि नहीं, यह जानने के लिए गुरु ने अपने छात्रों की परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने परीक्षा के लिए एक-एक करके सभी छात्रों को पास बुलाया और सभी से भिन्न-भिन्न प्रकार की साधनाएँ करवायीं। एक साधना ऐसी थी, जिसमें समस्त विद्यार्थी एक के बाद एक फेल होते गये। गुरुजी को लगा कि अब शायद कोई भी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पायेगा।
परीक्षा के लिए मात्र एक विद्यार्थी शेष रह गया था। गुरुजी ने उसे भी बुलाया। वह आया और विनय भाव से उसने गुरु के चरण-कमलों में हाथ जोड़ सिर झुकाकर नमन किया और गुरु का आशीर्वाद लिया। गुरु ने छात्र से कहा कि मुँह में एक चम्मच बूरा रखना है।
छात्र ने कहा - ठीक है, रख लूँगा। गुरुजी ने कहा रख लेगा तो अपना मुँह खोलो। छात्र ने अपना मुँह खोल दिया और गुरुजी ने एक चम्मच बूरा मुँह में डाल दिया। पश्चात् गुरुजी एकटक होकर उसकी मुख-मुद्रा देखते रहे। उस विद्यार्थी के चेहरे पर शांति छायी थी। कुछ समय बाद छात्र को मुँह खोलने के लिए कहा गया और उसके मुँह खोलने पर देखा गया कि मुँह में बूरा ज्यों का त्यों रखा है। छात्र को बूरे का स्वाद लेने का भाव नहीं आया। बूरे को मुँह में त्यों का त्यों देखकर गुरुजी प्रसन्न हुए।
उन्होंने कहा - प्रिय छात्र! तुम परीक्षा में पास हो गये। तुमने इन्द्रियों के विषयों पर विजय प्राप्त की है, तुम जितेंद्रिय हो। यही सच्ची साधना और अध्ययन का फल है। छात्र प्रसन्न हुआ।
आशय यह है कि जितेंद्रिय वही हो सकता है, जिसे दृढ़ता के साथ यह ज्ञान है कि इन्द्रिय विषयों में सुख नहीं है। यह ज्ञान हृदंगम होना जितेंद्रिय के लिए आवश्यक है। साथ ही आवश्यक है मन को नियंत्रण में रखना।
छोटी-सी बड़ी कहानी
एक बार एक दरिया ने बहते हुए छोटे-से झरने से पूछा कि क्या तुझे समंदर में मिल कर समंदर नहीं बनना पसंद नहीं है। झरना कुछ पल रुका, सोचा और बड़ी ही नम्रता से कहा - बड़ा बनकर खराब हो जाने से अच्छा है कि छोटा रह कर मीठा ही रहूँ।
Life Mantra
THREE THINGS
- Do not be ever controlled by these three things-
People, money and past experiences - Don’t do these three things -
- promise when you are happy
- respond when you are angry
- decide when you are sad
- Have these three things in your life -
- fortitude to stand no matter what
- tenacity to stick with your decision
- guts to deal with whatever is in front of you
- Three things you can’t recover in your life -
- the word after it is said
- the moment after it is missed
- the time after it is gone
- Three things to quit -
- trying to please everyone
- putting yourself down
- over-thinking
- Remember three things -
- be mindful of what you toss away
- be careful of what you push away
- think hard before you walk away
गुरु-वाणी के उत्तम आर्जव
आत्मस्वभाव को विपरीत मानना ही सबसे बड़ी वक्रता है। आत्मा तो सरलता के शुभ परिणाम या वक्रता के अशुभ परिणाम - इन दोनों से रहित एक ज्ञायकस्वरूपी है, उसकी श्रद्धा-ज्ञान को स्थिर रखना ही धर्म है। यह धर्म प्रत्येक गृहस्थ के हो सकता है। जिनके आत्मा में ऐसे सम्यक् श्रद्धा-ज्ञानपूर्वक अत्यंत सरलता प्रकट हो गई, उनके उत्तम आर्जव धर्म है। चारित्र दशा में कपट भाव तो होने ही नहीं देना और ‘सरलता करूँ’ - ऐसा शुभ भाव हो तो उसे भी छोड़कर वीतरागी सरलता प्रकट करना, उत्तम आर्जव धर्म है।
वाणी सर्वज्ञ की
नाशिर्न भाविर्न प्राप्य प्राप्ते च फलसन्ततिम्।
विचार्यैव विधातव्यमनुतापोज्झ्यथा भवेत्।।
जिस पदार्थ के लिए हम पुरुषार्थ कर रहे हैं, वह विनाशी है या अविनाशी? वह भविष्य में हमें प्राप्त हो सकता है या नहीं? प्राप्त होने पर वह फल देगा या नहीं? उससे लाभ होगा या नहीं? - इत्यादि बातों का विचार करके ही पुरुषार्थ करना चाहिए, अन्यथा पश्चाताप ही होगा।
दानपूजा तप और शील से संपन्न मनुष्य को क्या सिद्धि नहीं हो सकती!
अर्थात् सभी की सिद्धि हो सकती है।
- क्षत्रचूडामणि-19
जैसे लोहे का संग करने से अग्नि भी बड़े-बड़े घन द्वारा पीटी है, वैसे ही दुष्ट जनों के संग से भले पुरुष के गुण भी नष्ट हो जाते हैं।
- मुनिवर रामसिंह, पाहुड़ दोहा-148
जिस प्रकार रत्न-परीक्षक ठगे जाने के भय से परीक्षा करके रत्न को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार बुद्धिमान जीव परीक्षा करके धर्म को प्रयत्न से ग्रहण करते हैं। कुल-परंपरा से चले आये दारिद्रय तथा कुछ रोग आदि की तरह कुल-परंपरा से चला आया कुधर्म भी छोड़ना चाहिए।
- श्री नरेन्द्रसेन आचार्य, सिद्धांतसार संग्रह-1,16
कदाचित् सूर्य शीतल हो जाये, चंद्रमा उष्ण हो जाये, गाय के सींग से दूध निकलने लग जाये, विष से अमृत हो जाये, अमृत से विष-बेल उत्पन्न हो जाये, अंगार से श्वेतता आ जाये, अग्नि से जल प्रकट हो जाये, जल से अग्नि प्रकट हो जाये, कदाचित् नीम से सुस्वादु रस प्रकट हो जाये, परंतु दुष्ट बुद्धि दुर्जन के सभी सज्जन पुरुषों को प्रशस्त वाक्य नहीं उपलब्ध हो सकता है।
- श्री अभिगति आचार्य, सुभाषितरत्नसंदोह-442
पुरुषों को सर्वप्रथम तो समस्त प्रयोजनों का सिद्ध करने वाला निरंतर मौन ही अवलंबन करना हितकारी है और यदि वचन कहना ही पड़े तो ऐसा कहना चाहिए; सबको प्यारा हो, सत्य हो और समस्त जनों का हितकारक हो।
- श्री शुभचंद्राचार्य, ज्ञानार्णव 9-6
तप धर्म Anti-virus
यह anti-virus हमें विषय-भोग से बचाता है।
एक बार सम्राट चन्द्रगुप्त भटक कर एक गुफा के पास पहुँचे। गुफा में से किसी व्यक्ति की आवाज आ रही थी। वहाँ एक मुनिराज पाठ कर रहे थे। सम्राट ने पूछा - भीतर कौन है? भीतर से आवाज आई - पहले आप अपना परिचय दें कि आप कौन हैं?
सम्राट ने उत्तर दिया - मैं चक्रवर्ती हूँ।
भीतर से पुनः प्रश्न आया - आप चक्रवर्ती कैसे बने?
सम्राट ने उत्तर दिया - मैंने अपनी सेना के बल से षट्खंडों को वश किया है और उन पर विजय पाई है।
भीतर से आवाज आई - मैं भी षट्खंडों का विजेता चक्रवर्ती हूँ।
सम्राट ने आश्चर्य से पूछा - आप चक्रवर्ती कैसे हुए?
उत्तर आया - मैंने तप बल से मन-वचन-काय, राग-द्वेष-मोह - इन षट् खंडों को जीता है। क्या तुम इन पर विजय पा सके हो।
यह उत्तर सुनकर सम्राट चंद्रगुप्त स्वयं से भी बड़े चक्रवर्ती के सामने नत-मस्तक हो गया और उसने कहा - असली चक्रवर्ती तो आप ही हैं। आपके तप-बल के सामने मेरा सैन्य-बल कुछ भी नहीं है; क्योंकि जिसने स्वयं को जीता है, वही असली विजेता है।
गुरु-वाणी में उत्तम शौच/सत्य
स्नानादि से शरीर को स्वच्छ रखना, शौच धर्म नहीं है। शरीर की शुद्धि से आत्मा का धर्म मानना मिथ्यात्व है और पुण्य-पाप के भावों से आत्मा की पवित्रता होती है - ऐसा माननेवाले को किंचित् भी धर्म नहीं होता, किंतु उल्टी मिथ्यात्वरूपी मैल की पुष्टि होती है।
शरीर से भिन्न और पुण्य-पाप से रहित पवित्र आत्मस्वरूप की यथार्थ प्रतीतिरूपी जल द्वारा मिथ्यात्वरूपी मैल को धो डालना और पवित्र आत्मस्वरूप में एकाग्रता द्वारा रागादि मैल का धो डालना ही उत्तम शौच धर्म है। ऐसा धर्म मुनियों के होता है। जितना रागादि का विकल्प हो, वह तो अशुचि है।
त्याग धर्म Anti-virus
यह anti-virus हमारे अंदर मौजूद अनुपयोगी वस्तुओं को delete करने की सलाह देता है।
सन् 1912 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया गया। उस समय देशबंधु चितरंजन दास देश के अद्वितीय प्रतिभाशाली बैरिस्टर थे। महात्मा गांधी ने देशबंधु से देश-सेवा के लिए वकालत छोड़ देने का आग्रह किया। तब देशबंधु ने उत्तर दिया - आप मुझे वकालत करने दीजिए। उसकी 50 हजार रुपया से अधिक मासिक आमदनी में पूरी कांग्रेस को दे दिया करूँगा।
तब गांधीजी बोले - हमें रुपया नहीं चाहिए। रुपयों को लात मारने वाला त्यागी व्यक्ति चाहिए। तुम-सा व्यक्ति पाकर हम जितना चाहेंगे, उतना रुपया पा सकेंगे। दास बाबू ने गांधी जी की बात मान ली।
गुरु-वाणी में उत्तम सत्य
वस्तु का स्वरूप जैसा है, वैसा ही सत्य जानना, सो धर्म है। जैसी है, वैसी ही सत्य वस्तु जाने बिना धर्म हो ही नहीं सकता। सम्यग्ज्ञान से वाणी-विकल्परहित आत्मस्वरूप को जानने के पश्चात्, उस स्वरूप में स्थिरता करने में उत्तम क्षमादि दसों धर्म समाविष्ट हो जाते हैं और सत्य बोलने का, उपदेशादि का विकल्प उत्पन्न होना, व्यवहार से उत्तम सत्य है। सत्य बोलने के विकल्प को अथवा वाणी को ज्ञानी अपना स्वरूप नहीं मानते। मैं वीतराग भाव का कर्ता हूँ; इच्छा अथवा भाषा का कर्ता मैं नहीं हूँ और न ये मेरे कर्म हैं।
गुरु-वाणी में उत्तम संयम
पहले सत्समागम द्वारा आत्मा की पहचान करके, सम्यग्दर्शन-ज्ञान प्रकट करने के पश्चात् ही वीतराग भावरूप उत्तम संयम धर्म होता है। उत्तम क्षमादि दश धर्मों के यथार्थ स्वरूप को पहचानना चाहिए, उनके मूल स्वरूप को जाने बिना, मात्र रूढ़ि प्रमाण से बोलने अथवा शास्त्र बाँचने से आत्मा को कोई लाभ नहीं होता।
क्योंकि हेल्थ भी जरूरी है…
कौनसा नमक श्रेष्ठ
नमक और उसकी मात्रा भोजन का अहम हिस्सा है। इसके कम ज्यादा होने से बीपी, ओबेसिटी व कई अन्य तकलीफें हो सकती हैं। आमतौर पर घरों में दो तरह के नमक उपयोग में लेते हैं। व्रत के लिए सेंधा नमक और साधारण तौर पर टेबल सॉल्ट। इसके अलावा एक समुद्री नमक, जिसे मोटा नमक भी कहा जाता है। समुद्री नमक से ही आयोडाइड नमक बनाया जाता है।
GOOD
सामान्य नमक
यह वह नमक है, जो सामान्य तौर पर घर में प्रयुक्त होता है। इसे ट्रीटमेंट कर तैयार किया जाता है। समुद्री नमक को 1200 डिग्री फारेनहाइट पर ले जाकर बनाया जाता है। इसमें एंटी केकिंग एजेंट जैसे मैग्नीशियम कार्बोनेट, आयोडाइड आदि मिलाया जाता है।
क्यों कमजोर… एल्युमिनियम, मेरे भी शरीर के लिए ठीक नहीं माना जाता है। इस तरह के नमक के सेवन से स्कूल में सोडियम और पोटेशियम का संतुलन गड़बड़ा जाता है।
BETTER
समुद्री नमक
यह प्राकृतिक रूप से तैयार नमक है, इसलिए इसके नुकसान प्रोसेसड नमक के मुकाबले कम है। इसे डाइट में शामिल करने से लाभ हो सकते हैं।
क्यों अच्छा… मूल रूप से यह कई मिनरल्स को अपने में समेटे रहता है, लेकिन प्रोसेसिंग करते के बाद इसके मिनरल खत्म हो जाते हैं। चूंकि समुद्र में प्रदूषण अधिक हो गया है इस कारण से बड़ी समुद्री नमक प्रोसेस होकर टेबल सॉल्ट बन जाता है।
BEST
सेंधा नमक
सेंधा नमक या हिमालयन नमक के नाम से जाना जाने वाला नमक श्रेष्ठ है। यह चट्टानों से निकलता है, जो प्रदूषण के लाखों सालों पहले बनता है।
क्यों बेहतर… 84 मिनरल इसमें हैं। इसमें पीएच बैलेंस ठीक रहता है। इसमें शरीर में इलेक्ट्रिक टॉक्सिन खत्म होते हैं। इससे नर्वस सिस्टम ठीक से काम करता है। इसमें एनर्जी है। इसमें कई न्यूट्रिएंट्स ऐसे हैं जो इसमें रहते हैं। ऑस्टियोपोरोसिस, हार्ट और किडनी को स्वस्थ यह रखता है।
सेंधा नमक श्रेष्ठतम नमक है। यह श्वसन तंत्र को मदद करता है, ब्लड शुगर स्तर ठीक करता है। उम्र का असर दिखने नहीं देता। हड्डियों की ताकत बढ़ाता है। जबकि टेबल सॉल्ट में 2.5% केमिकल भरे होते हैं। जो ब्लीच कर तैयार किया जाता है…
साभार : दैनिक भास्कर, 5 मार्च 2017
दश लक्षण पर्व में खानपान की शुद्धता देखते हुए प्रत्येक जैन परिवार में भोजन में सेंधा नमक ही काम में लिया जाता है, परन्तु सेंधा नमक न सिर्फ शुद्ध है, बल्कि शरीर के लिए भी लाभदायक है। इसलिये सिर्फ पर्व के अवसर पर ही क्यों, हमें सेंधा नमक अपने दैनिक खान-पान में भी जोड़ना चाहिए, ताकि हमें मिल सके -
शुद्धता भी, स्वास्थ्य भी…
श्वसन प्रणाली
को मजबूत/साइनस से बचाता है।
मिनरल्स
शरीर के लिए आवश्यक कैल्शियम, आयडल, जिंक, पोटेशियम, मैग्नेशियम, कॉपर सहित 92 trace element में 84 मिनरल्स इसमें समाहित है।
प्रतिरक्षा प्रणाली
रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है, वजन घटाने में मदद करता है।
आँखें
के लिए हितकारी है।
हृदय
यह हृदय के लिए उत्तम, इससे उच्च रक्तचाप नहीं होता।
पाचन नली
दीपन और पाचन में मददरूप, विरेचन, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पथ्य में हल्का है। इससे पाचक रस बढ़ते है। एसिडिटी से आराम।
जोड़ एवं मांसपेशियां
क्रोनिक रोगों और रुमेटिज्म में काफी उपयोगी होता है, पैरों में सूजन एवं मोच में लाभदायक है।
आकिंचन्य धर्म Anti-virus
यह anti-virus हमें कम से कम data save करने की सलाह देता है।
ईरान में एक शक्तिशाली राजा हुआ। उसका हृदय गंगा जैसा निर्मल था। वहाँ के फकीर भी उसे पूज्य दृष्टि से देखते थे। उसकी एक पुत्री थी। प्रत्येक कार्य में वह बड़ी कुशल थी। वह जितनी शिक्षित और संस्कारित थी, उतनी ही सुंदर भी।
किसी दूसरे राजा ने उस राजा से कहा - मैं आपकी बेटी से शादी करना चाहता हूँ। तब ईरान के राजा ने कहा - राजन्! मुझे लड़की के लिए दूल्हा नहीं। अपितु त्यागी पुरुष चाहिए। कुछ समय पश्चात् उसने एक फकीर को देखा और उससे कहा - क्या आप शादी करना चाहते हैं?
फकीर ने कहा - शादी करना चाहता हूँ, किंतु मुझे जैसे गरीब को लड़की कौन देगा? मेरे पास तनिक भी धन नहीं है।
राजा ने कहा - मैं धनाढ्य की नहीं, धार्मिक व्यक्ति की खोज में हूँ। मैं दूँगा आपको अपनी लड़की।
फकीर - प्रभु! मैं तो अकिंचन (गरीब) हूँ। मेरे पास तो केवल तीन पैसे हैं।
राजा - आप अपने तीन पैसों से ही अगरबत्ती, कुंकुम आदि ले आइए, मैं अपनी बेटी का विवाह आपके साथ कर दूँगा।
फकीर सब सामग्री ले आया और राजा ने उसके साथ अपनी लड़की का विवाह कर दिया। फकीर उस लड़की को लेकर अपने निवास स्थान पर आया। लड़की ने ज्यों ही उस फकीर की झोपड़ी में प्रवेश किया त्यों ही वह चमक कर बोली - मैं इस घर में नहीं रह सकती।
फकीर - यह तो मैं जानता ही था कि तुम राजघराने की लड़की मुझे जैसे फकीर की झोपड़ी में कैसे रह सकोगी?
लड़की - पतिदेव! मैं आपकी झोपड़ी देखकर भागना नहीं चाहती हूँ। पर आपने जो रोटियों का संग्रह कर रखा है, इसे देखकर मन में घृणा उत्पन्न हो रही है। क्या आपको कल का भरोसा नहीं है?
फकीर - कुछ रोटियाँ बच गई थीं। मैंने सोचा, कल काम आ जाएँगी, इसलिए रख ली हैं।
लड़की - आवश्यकता से अधिक रखना अर्थात् किसी भी वस्तु का संग्रह करना बहुत बड़ा पाप है। संग्रह-वृत्ति की भावना से देश का पतन हुआ है। आप इसे छोड़ दीजिए। मैं यहाँ रहने को तैयार हूँ।
फकीर - जैसा तुम कहोगी, वैसा ही करूँगा और संग्रह को हेय समझँगा। तुम चिंता मत करो, मैं इन्हें आज ही बाहर कर दूँगा। अब वह लड़की फकीर की झोपड़ी में आनंद से रहने लग गई।
ब्रह्मचर्य धर्म Anti-virus
यह anti-virus हमें हमारे system की विशेषताएँ एवं खूबियाँ बताता है तथा अन्य virus के नुकसान से सावधान करता है।
गुरुकुल के स्नातकों की मनोवैज्ञानिक परीक्षा करने के लिए गुरु ने शिष्यों से कहा - प्रत्येक छात्र आधे मुहूर्त तक इस पहाड़ की तरफ देखता रहे और वहाँ जिसको जो सुंदर वस्तु दिखे, वह मुझे बताना।
सबने उस ओर देखा। समय पूर्ण होने पर किसी ने पत्थर, किसी ने कोई पेड़, किसी ने लताओं आदि की सुंदरता का वर्णन किया।
अंत में एक छात्र ने बताया कि मुझे सबसे सुंदर अपना ज्ञान ही दिखा, जो सबको जान सकता है। यदि ज्ञान न हो तो दुनिया की कितनी सुन्दर वस्तु की क्या कीमत!
गुरु-वाणी में धर्म का स्वरूप
गुरु-वाणी में उत्तम तप -
वास्तव में जो चारित्र को दुःख का कारण मानते हैं, वे अज्ञानी हैं। जो लोग उपवास को एवं चारित्र को दुःखदायमानते हैं, उनके सम्यग्दर्शन भी नहीं है। शुद्ध चिदानंद आत्मा की प्रतीति करके, उसके आनंदानुभव में लीन हो जाने पर इच्छाओं का नाश हो जाना ही उत्तम तप धर्म है।
गुरु-वाणी में उत्तम त्याग -
धर्म-ग्रंथ आदि के दान करने को गृहस्थ का त्याग धर्म कहा गया है। सम्यग्दृष्टि गृहस्थ धर्मात्मा जानता है कि बाह्य में पुस्तकादि लेने-देने की क्रिया आत्मा की नहीं है और अंतरंग में ‘वीतराग शासन जयवंत रहे, साधक-धर्मात्मा विद्यमान रहे और सम्यक् श्रुत ज्ञान की वृद्धि हो’ - ऐसी भावनाएं विकल्प भी राग है, आत्मा उसका कर्ता नहीं है। अंतरंग में परिपूर्ण शुद्ध चैतन्य स्वभाव की प्रतीतिपूर्वक जो ज्ञान की निर्मलता बढ़ती है और राग दूर होता है, वह त्याग है और वही धर्म है। परमार्थ से तो ज्ञान-ज्ञान में स्थित हुआ, वही त्याग है।
गुरु-वाणी में उत्तम आकिंचन्य -
आकिंचन्य अर्थात् परिग्रह रहितता। ममता ही परिग्रह है। ममता रहित वीतराग भाव ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है। भेदज्ञान द्वारा पर से भिन्न स्वभाव को जानने बिना, पर के प्रति ममत्व दूर नहीं होता और धर्म भी नहीं होता है।
गुरु-वाणी में उत्तम ब्रह्मचर्य -
‘ब्रह्म’ का अर्थ है, आत्मा का स्वभाव; उसमें विचरना, परिणमन करना, लीन होना सो ब्रह्मचर्य है। विकार और पर के संग से रहित आत्मस्वभाव कैसा है? - यह जाने बिना उत्तम ब्रह्मचर्य नहीं होता। लौकिक ब्रह्मचर्य, शुभग्राग है; धर्म नहीं है और उत्तम ब्रह्मचर्य, धर्म है; राग नहीं।
आपकी कलम से..
उपवास का सच्चा स्वरूप
आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने अपने अनुपम ग्रन्थ रत्नकरंड श्रावकाचार श्लोक-संख्या 105 से 110 तक के 6 श्लोकों में उपवास का समीचीन स्वरूप स्पष्ट किया है, जो बहुत ही महत्त्वपूर्ण और सभी के जानने योग्य है। उनके अनुसार उपवास में निम्नलिखित विशेषताएँ अवश्य होनी चाहिए; अन्यथा उसे उपवास नहीं माना जा सकता –
उसे अष्टमी-चतुर्दशी की पर्व-तिथियों में ही करना चाहिए।
उसे हर एक अष्टमी-चतुर्दशी की पर्व-तिथियों में करना चाहिए।
उपवास में चतुर्विध आहार का त्याग करना आवश्यक है।
इस दिन हिंसादि पाँचों पापों का भी त्याग करना आवश्यक है।
उस दिन सजने-सँवरने का भी त्याग करना चाहिए।
उस दिन पाँच इन्द्रियों के विषयों का भी त्याग करना चाहिए।
उस दिन स्नान-काजल आदि का भी त्याग करना चाहिए।
उस दिन उत्साहपूर्वक स्वाध्याय करना-कराना चाहिए।
उस दिन निद्रा-आलस्य का भी पूर्णतः त्याग कर निरन्तर ज्ञान-ध्यान में ही तत्पर रहना चाहिए।
उस दिन किसी भी वस्तु का ग्रहण, त्याग या विस्तरण बिना देखे-पंखे नहीं करना चाहिए।
उपवास के प्रति उत्साह में किंचित भी कमी नहीं आने देना चाहिए।
उपवास के विषय में समय, कर्तव्य आदि कुछ भी भूलना नहीं चाहिए।
इससे सिद्ध होता है कि उपवास एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक क्रिया है। उसे मात्र शारीरिक या सामाजिक क्रिया समझकर ऊटपटांग करने से उत्तम लाभ नहीं होता। उपवास का अर्थ सचमुच ही आत्मा के समीप वास करना है, जैसा कि शब्द से भी स्पष्ट पता चलता है- उप+वास = उपवास।
पुनश्च, यहाँ निम्न तथ्य भी ज्ञातव्य है –
धर्म की हर क्रिया उभय-लोक-सुखकारी होती है, अतः उपवास से भी अनेक लौकिक लाभ होते हैं। हाँ, मोक्षार्थी उनकी ओर ध्यान नहीं देता है।
व्रत-उपवास को अपनी शक्ति के अनुसार भी किया जा सकता है, परन्तु उत्तम उपवास का स्वरूप तो उक्त प्रकार का ही होता है।
– प्रो. वीरसागर जैन
राष्ट्रीय पर्व बनने की क्षमता
क्षमावाणी पर्व में
हमारे पास अपना राष्ट्रीय ध्वज है, राष्ट्रीय प्रतीक है, राष्ट्रीय पशु है और राष्ट्रीय पक्षी भी है; पर क्या एक राष्ट्रीय पर्व भी नहीं होना चाहिए? होना चाहिए, अवश्य होना चाहिए, और वह भी हमारी महान संस्कृति के अनुरूप ही महान होना चाहिए।
आप कह सकते हैं कि है तो सही, स्वतंत्रता दिवस है न! यह हमारा राष्ट्रीय पर्व ही तो है। ठीक है, तो सही, परंतु यह हमारी महान संस्कृति के अनुरूप नहीं है। इसके साथ हमारी परतंत्रता की स्मृतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। दूसरी बात यह है कि यह एक घटना प्रधान पर्व है, जो 15 अगस्त 1947 से ही प्रारंभ हुआ है, उससे पहले नहीं था। हमारी संस्कृति के समान सनातन नहीं है। अतः हमारा राष्ट्रीय पर्व कोई ऐसा ही चुना जाना चाहिए, जो हमारी सनातन भारतीय संस्कृति के अनुरूप हो, सनातन हो, विश्व कल्याणकारी हो और सर्वमान्य भी हो तो बहुत ही अच्छा।
हम समझते हैं कि इसके लिए यह क्षमावाणी महापर्व सर्वाधिक उपयुक्त सिद्ध हो सकता है। यद्यपि लोग इसे जैन-समाज का पर्व कहते-समझते हैं; पर वस्तुतः सूर्य-चन्द्र आदि के समान क्षमा भी एक अत्यंत सार्वजनिक वस्तु है। वह किसी व्यक्ति, समाज या जाति विशेष की अपनी बपौती नहीं हो सकती।
क्रोध सदा सर्वदा सभी के लिए अहितकारी है और क्षमा सदा सर्वत्र सभी के लिए हितकारी है; अतः क्षमावाणी पर्व को व्यक्ति, जाति, देश, काल आदि की किसी भी सीमा में भी नहीं बाँधा जा सकता।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जहाँ हम क्रोध की भयंकरता के परिणाम प्रतिदिन देख और भोग रहे हैं, यह क्षमावाणी पर्व अपनी और अधिक उपयोगिता को रेखांकित कर रहा है।
क्षमा के महत्त्व को सभी धर्मों ने मुक्त-कंठ से स्वीकार किया है, अतः इस दृष्टि से भी यह एक निर्विवाद पर्व प्रतीत होता है। यथा – भारतीय संस्कृति की प्राचीन काल से ही दो प्रमुख धाराएँ रही हैं – श्रमण और वैदिक। श्रमण-धारा को तो यह पर्व मान्य ही है, वैदिक धारा को भी यह पर्व सहर्ष मान्य है। वैदिक ग्रंथों में कदम-कदम पर क्षमा की श्रेष्ठता के विपुल गीत गाये गए हैं। यदि यह भी कहा जाए कि वैदिक धर्म का पूरा ढाँचा ही क्षमा भाव पर खड़ा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वृक्ष के मूल की भाँति क्षमा संपूर्ण वैदिक धर्म का मूल है। क्षमा के कारण ही वैदिक धर्म इतना उदार, सहिष्णु और व्यापक सिद्ध हुआ है। वैदिक ग्रंथों में अगत्
क्षमा के महत्त्व सूचक सभी कथनों को प्रस्तुत करने का अवकाश यहाँ नहीं है, तथापि एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।
सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण को मृत्यु जंगल में जर के बाण से हुई थी। बाण मारने के बाद घबराये हुए जर को श्रीकृष्ण क्या कहते हैं – यहाँ यह गंभीरता पूर्वक ध्यान देने योग्य है। वे कहते हैं –
मा भैर्जरे! त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे।
याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम्।। – श्रीमद्भागवत।।
अर्थात् हे जर! तुम दुखी मत होओ। उठो और जाओ। यह जो कुछ हुआ, सब ठीक ही हुआ। मेरी अनुज्ञा है कि तुम पुण्यवानों के लिए प्राप्त करो।
इससे सिद्ध होता है कि श्रमण-संस्कृति की भाँति वैदिक संस्कृति में भी क्षमा का महत्त्व समान भाव से स्वीकृत है।
अब यदि आगे चलें तो श्रमण और वैदिक संस्कृति ही नहीं; दुनिया के अन्य सभी छोटे-बड़े धर्म या संप्रदाय भी क्षमा के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। उनके ग्रंथों में भी क्रोध की निंदा और क्षमा की प्रशंसा पुरजोर ढंग से की गई है।
प्रमाण स्वरूप कतिपय प्रसंग/उद्धरण प्रस्तुत हैं। यथा –
श्रीकृष्ण की भाँति ईसा मसीह ने भी सूली पर चढ़ते हुए कहा था कि –
हे ईश्वर! इन्हें क्षमा करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं!
इसी प्रकार कुरान शरीफ में भी क्षमा के महत्त्व सूचक अनेक वाक्य उपलब्ध हैं। यथा – जो गुस्सा पी जाते हैं और लोगों को माफ कर देते हैं, अल्लाह ऐसी नेकी करने वालों से प्यार करता है। – कुरान शरीफ 3/134
जो वक्त पर धैर्य रखे और क्षमा कर दे तो निश्चय ही यह बड़े साहस के कामों में से एक है। – कुरान शरीफ 42/132
इसी प्रकार सिक्ख धर्म में भी क्षमा का बहुत महत्त्व बताया गया है। गुरु गोविंद सिंह कहते हैं – यदि कोई दुर्बल मनुष्य तुम्हारा अपमान करता है तो उसे क्षमा कर दो; क्योंकि क्षमा करना वीरों का काम है।
संत तुकाराम भी कहते हैं – जिस मनुष्य के हाथ में क्षमारूपी शस्त्र हो, उसका दुष्ट क्या बिगाड़ सकता है?
इस प्रकार हम देखते हैं कि क्षमावाणी ही एक ऐसा निर्विवाद पर्व हो सकता है, जो
जुलाई-सितम्बर-2017
भारतीय संस्कृति के अनुरूप हमारा राष्ट्रीय पर्व सिद्ध हो सकता है। इतना ही नहीं, यदि आगे बढ़कर देखें तो वैश्वीकरण के इस दौर में विश्व पर्व बनने की क्षमता भी इस क्षमावाणी पर्व में निहित है। जो भी हो, कम से कम हमें इसे अपना राष्ट्रीय पर्व तो घोषित करना ही चाहिए। सुधीजनों से इस विषय पर निष्पक्षता पूर्वक विचार करने का अनुरोध है।
- डॉ. वीरसागर जैन (विभागाध्यक्ष) जैनदर्शन विभाग
श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, (मानित विश्वविद्यालय)
नई दिल्ली-110016
Aatmbook
Aatmbook helps you connect with your soul.
फ़ुरसत अगर मिले
तो मुझे पढ़ना ज़रूर।
मैं तेरी उलझनों का
मुकम्मल जवाब हूँ।।
- जिनवाणी
शब्द शक्ति
प्रसाद
हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है और कोई भी अक्षर वैसा क्यों है?
उसके पीछे कुछ कारण है। इस सिद्धांत के अनुसार प्रसाद का यह अर्थ होता है। प्रभु के साक्षात् दर्शन अर्थात् निज भगवान आत्मा के साक्षात् दर्शन करने वाला जीव अपूर्व आनंद में स्नान करके तृप्त हो जाता है, तब जगत के जीवों को भी वह आनंदमयी प्रसाद बांटता है अर्थात् विधि बताता है। तब कहा जाता है कि हम मंदिर जी गए, प्रभु दर्शन किये, आप सब भी आओ, प्रसाद लो।
लेकिन कालांतर में भोले जीवों ने प्रसाद के नाम पर खाने की वस्तुएँ बाँटने की क्रिया से प्रसाद को जोड़ दिया।
- रश्मि जैन, फरीदाबाद
जानी-अनजानी बातें…
- क्या आप जानते हैं कि जैन आगम में मात्र दस प्रकार से ही धर्म के भेदों का कथन नहीं किया गया है; अपितु दया धर्म, अहिंसा धर्म, मुनिधर्म और श्रावक धर्म के भेद से दो प्रकार का, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के भेद से तीन प्रकार का तथा श्रुतधर्म, आस्तिक्य धर्म और चारित्र धर्म की अपेक्षा भी तीन प्रकार के कहे जाते हैं, परंतु अनेक भेद होते हुए भी धर्म तो एक ही है। मात्र कथन की अपेक्षा भेद है।
- तीर्थंकरों के समान तीर्थंकरों के माता-पिता, बलभद्र, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण और यहाँ तक कि समस्त भोगभूमिया के जीवों के भी आहार तो होता है, परंतु मल-मूत्र रूप नीहार नहीं होता।
- तीर्थंकर सदा सोलह वर्ष की आयु की अवस्था वाले पुरुष के समान अपने रूप से सुशोभित होते हैं तथा उनके दाढ़ी-मूँछ भी नहीं होती है तथा सिर के बाल भी अन्य पुरुषों के समान न तो विशेष बढ़ते हैं और न ही कम होते हैं। केवल शोभा रूप ही उत्पन्न होते हैं और शोभा रूप ही रहते हैं।
उलझे सवालों के सुलझे जवाब
प्रश्न - धर्म तो प्रतिदिन करना चाहिए। फिर उसे मात्र दस दिन ही पर्व के रूप में मनाना कहाँ तक उचित है?
समाधान - सत्य तो यही है कि यह पर्व किसी तिथि या दिनों तक सीमित नहीं है। पर्व शब्द का अर्थ तो पवित्रता होता है और जिस आत्मा में वीतराग भाव रूप पवित्रता प्रकट होती है, उसके लिए तो प्रत्येक दिन ही पर्व है।
प्रश्न - दशलक्षण पर्व और पर्यूषण पर्व में क्या अंतर है?
समाधान - उद्देश्य की अपेक्षा तो दशलक्षण पर्व और पर्यूषण पर्व में शब्दों में कोई अंतर नहीं है; क्योंकि दोनों ही पर्वों का उद्देश्य राग-द्वेष आदि विकारी भावों से दूर अपने आत्मा के वीतराग भाव के समीप जाना है, परंतु शाब्दिक अर्थ की अपेक्षा देखा जाए तो जहाँ दशलक्षण धर्म नाम उत्तम क्षमा आदि धर्म के पहचान के दस लक्षणों के आधार पर रखा गया है, वहीं पर्यूषण शब्द परि (चारों ओर से) + ऊषण (जलाना) - इन शब्दों के मेल से बना है। जिसका तात्पर्य है, आत्मा को सभी ओर से संयमित करके चारों ओर से कर्मों को जलाना।
जहाँ दशलक्षण पर्व दिगंबर मतावलंबियों द्वारा प्रयोग किया जाता है, वहीं पर्यूषण शब्द श्वेतांबर मतावलंबियों द्वारा प्रयोग किया जाता है तथा दशलक्षण पर्व तो नाम के अनुरूप दस दिन तक मनाये जाते हैं, परंतु पर्यूषण पर्व आठ दिन तक मनाये जाते हैं। जिस दिन पर्यूषण पर्व पूर्ण होते हैं, ठीक उसी दिन दशलक्षण पर्व प्रारंभ होते हैं।
प्रश्न - वास्तव में तो धर्म एक ही है। फिर उसे दस प्रकार का क्यों कहा गया?
समाधान - सत्य तो यही है कि धर्म तो एक ही है, परंतु धर्म के स्वरूप को समझाने के लिए धर्म के लक्षण दस प्रकार के कहे गए हैं। जैसे किसी भी वस्तु को समझाने के लिए उसके आकार-प्रकार, रंग-रूप या अन्य चिह्नों के माध्यम से उसके स्वरूप को समझने से वह वस्तु अनेक प्रकार की नहीं हो जाती, उसी प्रकार क्षमा आदि धर्मों के माध्यम से धर्म को समझने से धर्म भी दस प्रकार का नहीं हो जाता। वह तो एक ही रहेगा।
बिखरे मोती
पूजाकोटिसमं स्तोत्रं स्तोत्रकोटिसमं जपः।
जपकोटिसमं ध्यानं ध्यानकोटिसमं क्षमः।।
‘करोड़ों पूजा के बराबर एक स्तोत्र है, करोड़ों स्तोत्रों के बराबर एक जप, करोड़ों जप के बराबर एक ध्यान और करोड़ों बार किये गये ध्यान के बराबर एक बार की क्षमा बताई गई है।’
दिन दश आदर पाय के, कर ले आप बखान।
जब लगै काक श्राद्धपक्ष, तब लग तुझ सम्मान।।
जिस प्रकार श्राद्ध पक्ष में कौए का हर जगह सम्मान होता है, तत्पश्चात् कोई घर पर बैठने भी नहीं देता; उसी प्रकार जब तक पुण्यौदय है, तब तक मान-सम्मान, वैभव, बल मित्रगण हैं; पर पुण्यौदय के क्षीण होते ही यह सभी नष्ट हो जाते हैं या छोड़कर चले जाते हैं।
प्रियवाक्यप्रदानेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् तदेव वक्तव्यम्, वचने का दरिद्रता।।
प्रिय वाक्य बोलने से प्रत्येक प्राणी सन्तुष्ट होता है; अतः हमें प्रिय ही को बोलना चाहिए। वचनों में कंजूसी क्या करना?
Difficulties in your life dont come to destroy you, but to help you know your hidden potential.
Silence is the best answer for all questions and smile is the best reaction to all situations.
Two things define you - your patience when you have nothing and your attitude when you have every thing.
दशरक्षण पर्व पर
सादर निवेदन !
धर्मप्रेमी बन्धुओं,
दशलक्षण पर्व दस दिवस जीवन के महत्त्वपूर्ण दिवस हैं। इस मांगलिक अवसर पर हमारा आपसे हार्दिक निवेदन है -
- दशलक्षण पर्व भोग के नहीं योग के, राग के नहीं त्याग के पर्व हैं। इन पर्वों को देव-शास्त्र-गुरु की यथायोग्य आराधना करके एवं संयम, सदाचार पूर्वक ही मनाएँ।
- आपके नजदीक जहाँ भी त्यागियों/विद्वानों के प्रवचन हों, समय निकालकर सुनने अवश्य जावें, जिनवाणी सुनने से ही धर्म का सत्य स्वरूप ज्ञात होगा।
- यदि आपके बच्चे प्रातः विद्यालय जल्दी जाते हों तो उन्हें दिन में या सायंकाल मन्दिर जाने व पर्व संबंधी जानकारी प्राप्त करने हेतु अवश्य प्रेरित करें।
- सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ज्ञानवर्धक प्रश्नोत्तरी, धार्मिक पूजन-भजनों पर आधारित अन्त्याक्षरी, महापुरुषों के जीवन पर आधारित संवाद आदि कार्यक्रम ही आयोजित करावें। मात्र मनोरंजन के नाम पर नृत्य/मेहंदी/फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रम कर अपने महत्त्वपूर्ण दिवसों का दुरुपयोग न करें।
- सभी विद्वज्जन जिनवाणी के माध्यम से संयम/सदाचार/भक्ति/तत्त्व की चर्चा करके लोगों को धर्म के प्रति आकर्षित होने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देवें। तेरापंथी/बीसपंथी/सोनगड़ी आदि मतभेद पैदा करने वाली चर्चायें न करावें।
- यह पर्व कषाय घटाने/मिटाने के पर्व हैं, बढ़ाने के नहीं। मतभेद बढ़ाने के नहीं, मतभेद व मनभेद मिटाने के पर्व हैं। इन्हें यही मानकर मनावें।
- आपको जो पद्धति अच्छी लगे, उसी के अनुसार धर्माराधना करें; किंतु दूसरों के ऊपर दबाव न डालें और दूसरों की आराधना में विघ्न/बाधा न हो - ऐसा कार्य करें।
आगे! सुखदायक, पुण्यवर्धक पर्व को आत्महित की भावना से मनाने का संकल्प करें।
- पण्डित राजकुमार शास्त्री, उदयपुर
क्या आपका मन जीवों की हिंसा से काँपता है?
आपके मन में दया और करुणा है?
क्या परिणामों में प्रत्येक जीव को सुखी देखने की भावना है?
तो फिर सर्वोदय अहिंसा अभियान से जुड़कर अपनी भावना को पूर्ण कीजिए!
हम प्रतिवर्ष भगवान महावीर के निर्वाण महोत्सव को अत्यंत उत्साह और श्रद्धा से मनाते हैं। अहिंसा के उद्घोषक, सभी आत्माओं को समानता का संदेश देने वाले वीर प्रभु के मंगल पर्व के दिन हमारे ही बंधु जन पटाखे फोड़कर जिनशासन को कलंकित करते हैं। इनमें कई तो अज्ञानवश और कुछ इसके परिणामों से अनजान रहकर यह कार्य करते हैं। हम इसे रोकने की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास कर सकते हैं।
इसी भावना से देशव्यापी सर्वोदय अहिंसा अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें पटाखों से होने वाली हिंसा जन-धन की हानि की जानकारी देने वाले रंगीन पोस्टर्स, पम्फलेट आदि का प्रकाशन किया जाता है तथा बच्चों/युवाओं में जागृति हेतु अनेक प्रतियोगिताओं/रैलियों का आयोजन किया जाता है। हजारों की संख्या में प्रकाशित इन पोस्टर्स को सवेंद्रि निःशुल्क भेजा जाता है। स्कूल/कॉलेजों में इन्हें प्रदर्शित कर छात्रों से पटाखे न फोड़ने के संकल्प पत्र भरवाये जाते हैं। प्रतियोगियों और संकल्प लेने वालों को प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया जाता है।
अभियान के कारण हजारों बच्चों/युवाओं ने पटाखे न फोड़ने का संकल्प लिया तथा अन्य अनेक संस्थायें इस कार्य में सहयोग कर रही हैं। कई राज्यों के मुख्यमंत्री, माननीय राज्यपाल महोदय तथा अन्य प्रसिद्ध सामाजिक प्रतिष्ठित लोगों ने सर्वोदय अहिंसा अभियान का समर्थन एवं सराहना की है।
अभियान सुचारु-निर्बाध संचालन हेतु आपका सहयोग आमंत्रित है -
| परम संरक्षक | 31000 | संरक्षक | 2100 |
|---|---|---|---|
| परम सहायक | 11000 | विशेष सहायक | 5100 |
| सहायक | 2100 | सदस्य | 1100 |
सहयोगियों के नाम पोस्टर में प्रकाशित किये जायेंगे। राशि सर्वोदय अहिंसा के नाम से भेज सकते हैं या (0247000101256826 IFSC Code : PUNB0024700) में जमा कर सूचित करें।
प्रचार सामग्री निःशुल्क मंगवा कर भी अभियान में सहयोगी बन सकते हैं।
संजय शास्त्री (संयोजक)
सर्वोदय अहिंसा
यदि न मिले तो निम्न पते पर भेजें
प्रकाशकीय एवं संपादकीय कार्यालय
सर्वोदय अहिंसा बी. 180 ए. 2 मंगल मार्ग, बापू नगर, जयपुर-15 + 91 9785 999100
[email protected]
हमें इंतजार रहेगा आपके
महत्त्वपूर्ण सुझावों का…
संपादिका - प्रतीति जैन पाटील
+ 91 94139 75133
सहयोग अपेक्षित है
आपका सहयोग
अपेक्षित है !
- आपके अमूल्य सुझावों द्वारा।
- प्रकाशन हेतु सामग्री द्वारा।
- योग्य पाठकों तक पत्रिका पहुँचा कर।
सम्पर्क सूत्र
संजय शास्त्री
95092 32733
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3098.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है