Broccoli खाने में दोष?

According to Wikipedia:

Broccoli is an edible green plant in the cabbage family (Brassicas) whose large flowering head and stalk is eaten as a vegetable. The word broccoli comes from the Italian plural of broccolo, which means “the flowering crest of a cabbage”, and is the diminutive form of brocco, meaning “small nail” or “sprout”.
Broccoli is classified in the Italica cultivar group of the species Brassica oleracea. Broccoli has large flower heads, usually dark green in color, arranged in a tree-like structure branching out from a thick, edible stalk which is usually light green. The mass of flower heads is surrounded by leaves. Broccoli resembles cauliflower, which is a different cultivar group of the same Brassica species. Combined in 2016, China and India produced 73% of the world’s broccoli and cauliflower crops.

Hence, it is clear that broccoli is a flower which is similar to cauliflower. We do not eat cauliflower because it is a flower and a flower contains many small insects as well as microbial. It is forbidden to eat gulkand made of roses for the same reason for being a flower.

This source gives the following reason too:

Cauliflower and broccoli that have velvety surfaces are not consumed by orthodox Jains. Very tiny flee like flying insects that grow in and around the farms, get stuck on to their velvety surfaces, and can not be fully removed in spite of careful washing.

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Unfortunately now a days, loads of pesticide is used to kill insects and pests. While there is a likelihood of finding some of these pests in broccoli but they are largely pest free. Also washing then carefully with separated florets does the trick. Now the question arises of ‘sachit’ bhojan … to harvest them, farmer needs to cut of the plant when it is still alive. I am not sure if there is still life in broccoli which we get in market.

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तरबूज़ खाने में भी कोई दोष है या नहीं ?

दोष है।
1.यह बहुबीज है।इसमें बीज गूदे के अंदर रहते है।
2.यह बड़ा फल है।इसको बिनारते समय परिणाम खराब होना स्वाभाविक है।और कभी भी इसका सेवन अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता।इसलिए अधिक हिंसा होती है।

इसलिए बहुत से ज्ञानी विद्वान इसका सेवन नही करते।पर भूमिका अनुसार त्याग अपेक्षित है।

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@Tanmay_Jain जी
तरबूज या अन्य फल आदि खाने में सर्वथा दोष नही ऐसा नही कह सकते,
अपेक्षा से दोष अधिक या कम होता है, एकेन्द्रीय (सचेत ) के घात का दोष तो है ही।

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सूक्ष्मता से विचार किया जाए तो दोष तो सब में है… किसी न किसी अपेक्षा से इनका पालन करना चाहिए, जैसे कि महाव्रत के धारक मुनि को हिंसा त्याज्य है किंतु श्रावक की भूमिका में वही पाप मर्यादा रूप में है, अमर्यादित नहीं…

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चरणानुयोग में-

  • शक्ति प्रमाण अवश्य पालन करना चाहिए,
  • जितना पालन नहीं कर पा रहे हैं उसकी भावना भानी चाहिए, और
  • जो पालन कर रहे हैं उनकी अनुमोदना करनी चाहिए।
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जिनागम में इस इस कहीं पर नही है इतना उपवास करेंगे तो सम्यक्त्व प्राप्त होगा परंतु अभक्ष्य ( बाजार का भोजन,कंदमूल,आदि) का सेवन करने वाला सम्यक्त्व की पात्रता में नही आता।क्योंकि जीव को रसना इन्द्रिय की लोलुपता पड़ी हो तो आत्मसन्मुख होना मुश्किल है।
श्रावक को कषाय वश,प्रमाद वश अतिचार अनाचार लगता रहता है ,इसी लिए श्रावक को लघुप्रतिक्रमण,सामायिक आदि रोज करनी चाहिए इससे जीव की परिणति ढिली पड़ती है।

अंतरंग विशुद्धि बढ़ने से चरित्र धीरे धीरे बढ़ ही जाता है।इसी लिए तो तीन चौकड़ी कषाय जिनकी नष्ट हो गई है वैसे मुनिराज का चारित्र( पांच महाव्रत आदि) सहज में ही पलता.

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