अनेकान्त और स्याद्वाद | Anekant and Syadvad

What is the difference between Anekant and Syadvad ?
I have read its theory. Can anyone explain me the difference with practical approach ?

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अनंत धर्मात्मक वस्तु ही अनेकान्त है । और उस वस्तु के अनेकान्त स्वरुप को समझाने वाली कथन पद्धति को स्याद्वाद कहते हैं।
जैसे जीव द्रव्य है उसमें अनंत धर्म विद्यमान हैं सो वह अनेकान्तात्मक वस्तु है
और उसमें परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले अनंत धर्म भी विद्यमान है जैसे भेद-अभेद , नित्य- अनित्य इत्यादि

और यह साधारण सी बात है कि जब हम इन गुणों को समझेंगें या समझायेंगे तो एक समय में एक ही गुण को समझ सकते है या बोल सकते है (वक्ता के अभिप्राय पर निर्भर करता है) इसे स्याद्वाद कहते हैं।
अनेकान्त में मुख्य गौण धर्म नहीं होते है क्योंकि अनंत धर्मों से युक्त वस्तु ही अनेकान्त है। सभी धर्म समान रूप से रहते हैं।
जबकि स्याद्वाद में मुख्यता गौणता होती है।
कभी वस्तु की नित्यता की चर्चा कभी अनित्यता की (प्रसंगानुसार)।

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Confusion cleared. Thanks for such a simplified explanation :+1:t2:

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Read more about this topic here, https://sarvarth1803.wordpress.com/2017/08/03/स्याद्वाद-और-अनेकान्त/

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Great effort @Sarvarth.Jain

Anyway, you explained the difference between गुण and धर्म in your article. There is one of thing, शक्तियाँ (referred from समयसार 47 शक्तियाँ प्रकरण).

In which above 2 types we can categorize शक्तियाँ or it’s a totally different type?

Well explained. Thanks for sharing the article.