अमृत वचन - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’ | Amrut Vachan

लेखक - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

Contents :

प्रकाशकीय


प्रेरणा

१. भगवान आत्मा अनन्तगुणों से सम्पन्न, अनन्त शक्तियों का अखण्ड पिण्ड, अनंतधर्मात्मक, ज्ञानानन्दमय, अनन्त महिमावन्त, अतीन्द्रिय महापदार्थ है |
२. निमित्त, भाग्य और भवितव्य के भरोसे रहने वाले प्रमादी अथवा स्वच्छन्द जीव मोक्षमार्ग के पात्र भी नहीं होते |
३. सर्वज्ञदेव द्वारा कहे तत्त्वों का सम्यक् निर्णय कर निरन्तर तत्त्वविचारपूर्वक स्वानुभव के लिए उद्यमी जीव ही मोक्षमार्गी होते हैं |
४. जिनालय में विराजमान जिनबिम्ब देहालय में विराजमान चिद्बिम्ब (निजदेव) को समझने एवं स्मरण करने के लिए हैं |
५. अन्तर्दृष्टीपूर्वक भायी गयी सम्यक् भावना सफल होते ही है |
६. हे भव्य ! अपनी शक्तियों को अन्तर्मुख होकर पहिचान | तेरी एक-एक शक्ति भी अद्भुत अनन्त सामर्थ्यवान् है |
७. आत्मानुभव पूर्वक प्रगट होने वाले आत्मामय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र से पर्यायार्थिक नय से आत्मा स्वयं ही शोभायमान एवं त्रैलोक्यपूज्य हो जाता है |
८. सम्यग्दर्शनादि तो निर्मल पर्यायें हैं - इनकी भावना से पुण्य होता है | सम्यग्दर्शनादि तो आत्मा निर्विकल्प भावना से प्रकट होते हैं |
९. अनादिकाल से भूले हुए निज चैतन्य स्वभाव को अब शीघ्र ही पहिचानो |
१०. रागादि से भिन्न निज ज्ञानानन्द स्वभाव का अनुभव करो, तभी सुख प्रगट होगा |


  1. The Godly soul is a great imperceptible matter of infinite qualities, infinite supreme powers, infinite virtues, knowledge, joy, infinite glory.
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  1. अज्ञानी इच्छाओं की पूर्ति में सुख मानता है और ज्ञानी इच्छाओं के अभाव में ।
  2. सहज प्रभुतामय शुद्धात्मा की आराधना से ही पर्याय में प्रभुता प्रगट होती है ।
  3. निजस्वरूप में लीनतारूप शुद्धोपयोग ही साक्षात सुखस्वरूप और अक्षय सुख का कारण है ।
  4. स्वरूप से च्युत होने पर सर्व दोष उत्पन्न होते हैं और अच्युत (लीन) होने पर सर्व दोषों का अभाव होता है ।
  5. आत्मा सहज सुख स्वरूप है और आत्मा की आराधना ही सर्व दुःखों के अभाव का सच्चा उपाय है ।
  6. रागादि से भिन्न ज्ञायक स्वभाव की दृष्टि ही परमार्थ से सम्यग्दर्शन है ।
  7. स्वभाव और स्वभाव की आराधना ही इष्ट है । स्वभाव से विपरीत सर्व विभाव तो अनिष्ट ही हैं ।
  8. विषयों में प्रवृत्ति होने पर आनन्द आता नहीं अपितु आनन्द का घात होता है ।
  9. शरीरादि समस्त परपदार्थों के लक्ष्य से होने वाले सभी विकल्प मिथ्या हैं, अतः क्लेशकारी ही हैं ।
  10. इच्छा के प्रतिकूल परिणमन का लक्ष्य करके दुःखी होना आर्तध्यान है ।
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  1. ज्ञान आनन्दमय होता है । आनन्द से रहित परलक्ष्यी ज्ञान तो वास्तव में ज्ञान ही नहीं है ।
  2. धार्मिक कार्यों में यथायोग्य अनुमोदना एवं सहयोग न होना भी तीव्रकषाय का लक्षण है ।
  3. चैतन्य स्वरूप आत्मा की निर्विकल्प अनुभूति ही सच्चा धर्म है ।
  4. अन्तर्दृष्टि पूर्वक श्रेष्ठ परिणामों वाले जीव ही सच्चे श्रेष्ठी हैं ।
  5. रागादि और ज्ञान परस्पर विरुद्ध स्वभाव वाले हैं वे कदापि एक नहीं हो सकते ।
  6. पापोदय से होने वाली दरिद्रता, मलिनता या हीनता को देखकर किसी जीव का तिरस्कार करना अभिमान का ही लक्षण है ।
  7. जिनवाणी का अभ्यास रागादि मिटाने के लिए करना ।
  8. जिनवाणी के कथनों से रागादि का पोषण करना तो महापाप का कारण है ।
  9. समय का सदुपयोग समयसार समझे बिना नहीं होगा ।
  10. धर्म के प्रति विरोध के भाव से अपना ही अहित होगा ।
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  1. स्वभाव से मैं वर्तमान में ही परमात्मस्वरूप हूँ ।
  2. चैतन्य के व्यापार में हानि के लिए अवकाश ही नहीं । करना कुछ रहता नहीं बस आनन्द ही आनन्द अथवा लाभ ही लाभ है ।
  3. कभी चाहते हुए भी नहीं होता, कभी न चाहते हुए भी हो जाता है अतः चाह व्यर्थ ही आकुलतारूप होने से त्याज्य है ।
  4. अनित्य संयोगों में नित्य की कल्पना रूप मोह अनन्त क्लेश का कारण है ।
  5. धार्मिक क्रियाएँ या ज्ञानाभ्यास करते हुए भी मोह छूटे बिना कल्याण संभव नहीं ।
  6. दानादिक देते हुए भी अपना भला तो अपने लोभादिक घटने से ही होगा । यदि अभिमान आ जाए तो अपना अहित ही होगा ।
  7. यथार्थ तत्वनिर्णय के बिना जीव जिनवाणी के कथनों से भी स्वच्छन्दता, प्रमाद या पक्ष का पोषण ही करता है ।
  8. बाहरी जड़ मुद्राओं को देखकर प्रसन्न होना तो रौद्रध्यान है, जिनमुद्रा (वीतराग मुद्रा) को देखते हुए प्रसन्न होना व्यवहार धर्मध्यान है । वास्तव में तो चिन्मुद्रा (चित्स्वरूप) को देखकर प्रसन्न होना ही परमार्थ से धर्मध्यान है ।
  9. सर्वज्ञदेव का स्वरूप समझ में आने पर जीवन में सहज वैराग्य होता है । बाह्य जगत से उदासीनता और स्वरूप की आराधना का उत्साह होता है । तभी विश्व के सभी क्रमबद्ध परिणमन की स्वानुभवपूर्वक सम्यक प्रतीति होने से न आकुलता, न अधीरता और न प्रमाद होता है । सहजता, निश्चिंतता और समता से सुशोभित जीवन स्वयमेव प्रशंसनीय हो जाता है ।
  10. समस्त क्लेशों का कारण स्वरूप की विराधना ही है ऐसा समझे बिना जीव बाहर में व्यर्थ भटकता है इससे तो क्लेश ही बढ़ता है ।
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  1. हे भव्य ! यह आत्मा स्वभाव से ही भगवान है - ऐसा समझकर पर्याय में भी भगवान बनने के लिए स्वभाव की आराधना कर ।
  2. संयोगों और पर्यायों में ही विमोहित जीव आत्मा की प्राप्ति नहीं कर सकता ।
  3. निर्ग्रन्थ मार्ग की प्राप्ति के लिए निर्ग्रन्थदृष्टि पूर्वक निर्ग्रन्थ स्वभाव की भावना भानी चाहिए । अहो ! आत्मा का स्वभाव ही निर्ग्रन्थ है ।
  4. स्वयं की ज्ञानदृष्टि या तत्त्वदृष्टि हुए बिना ज्ञानी की सही पहिचान नहीं होती ।
  5. अन्तर में उछलते हुए ज्ञानानन्द के सागर में निमग्न हुए बिना मात्र बाह्य में भटकने से ज्ञान और आनन्द कैसे हो ?
  6. सम्यक्त्व-सन्मुख जीव को तत्त्वों का यथार्थ निर्णय होने से वह न तो व्यवहारिक क्रियाओं में अटकता है और न शुद्धनय के विकल्पों में । वह निरन्तर आत्मानुभूति के लिए उद्यमी रहता है ।
  7. जो विषय-कषायों की अनुमोदना भी करते हैं वे ज्ञानी कैसे हो सकते हैं ?
  8. राग प्रशस्त भले ही हो परन्तु आकुलतामय ही है ।
  9. विवेकी जीव निशल्य रहते हैं ।
  10. बाह्य में अपनत्व, कर्तृत्व और अनुकूलता में सुख की कल्पना करके मग्न रहने वाले जीव को मुक्तिमार्ग के लिए प्रयत्न ही नहीं होता ।
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  1. योग्य वैयावृत्ति का अभाव अरुचि अथवा मिथ्यात्व का लक्षण है ।
  2. क्रमबद्ध परिणमन की प्रतीति स्वानुभव होने पर ही होती है । उससे पूर्व तो आगम और युक्ति से यथार्थ निर्णय होता है ।
  3. वस्तुस्वरूप समझने के लिए अपनी ही पात्रता और पुरुषार्थ प्रबल कारण है ।
  4. अहो ! महाहर्षपूर्वक स्वानुभव का उद्यम कर, उससे तेरा दुःख निश्चित ही मिटेगा ।
  5. आत्मस्वरूप को यथार्थ समझ कर प्रत्यक्ष अनुभवन के लिए कौतुहली (जिज्ञासु) हो ।
  6. पंचम भाव की अंतरंग में बारम्बार भावना भाओ । इसी उपाय से मोह मिटेगा ।
  7. जिनेन्द्र देव का सच्चा भक्त प्रतिकूलताओं में भी दुःखी नहीं होता ।
  8. पर्यायदृष्टि जीव दुःख दूर करने के लिए व्यर्थ विषयों में भटकता है ।
  9. परमभाव ही अलौकिक भाव है और परमभाव में रमती हुई वृत्ति ही अलौकिक वृत्ति है ।
  10. मुक्ति के लक्ष्य वाला जीव भव-बन्धन के कारणरूप परिग्रह स्वीकार नहीं करता ।
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  1. वीतरागी देव-गुरु की भक्ति, स्वरूप की भावना के लिए है ।
  2. अनंत दुःखों के कारण इन्द्रिय सुखों से भयभीत चित्त वाले जीव ही आत्मार्थी हो सकते हैं ।
  3. आत्मरस में तृप्त रहते हुए मुनिराज परिषहों को भी मात्र भिन्न ज्ञेयरूप से जानते हैं ।
  4. निज ज्ञातास्वरूप का ज्ञाता ही वास्तव में ज्ञाता होता है । इसके बिना समस्त परलक्षी ज्ञान भी अज्ञान ही है ।
  5. आत्मभावना होना ही शास्त्राभ्यास का परमार्थ फल है ।
  6. हम अपने से जितनी दूर रहेंगे, सुख भी हमसे उतनी दूर रहेगा ।
  7. आत्मध्यान के अतिरिक्त कुछ भी करने योग्य नहीं है । अपने में पर का कुछ करने की या अपनी पर्याय को भी आगे-पीछे करने की शक्ति नहीं है और अखिल विश्व में कुछ करने के लिए अवकाश ही नहीं है । अतः कर्तृत्व के समस्त विकल्प मिथ्या हैं ।
  8. समस्त पक्षों से विरक्त हो, शुद्धनय के पक्ष में आकर, पक्षातिक्रान्त हो जाओ ।
  9. तत्त्व की चर्चा भी सूक्ष्म है अतः उपयोग को एकाग्र कर सुनो ।
  10. परम सूक्ष्म आत्मस्वरूप की प्राप्ति सूक्ष्म उपयोग पूर्वक ही सम्भव है ।
  1. स्व को समझे बिना स्वार्थ और स्वास्थ्य की सभी बातें मिथ्या हैं ।
  2. अपने चैतन्य वैभव से स्वयं को वैभववान समझने वाला ज्ञानी बाह्य वैभव से सहज विरक्त होता है ।
  3. सौधर्म इन्द्र हजार नेत्रों से बाल तीर्थंकर के अति सुन्दर रूप को निहारते हुए भी तृप्त नहीं होता - ऐसा जानकर पर की ओर देखने से विरक्त हो ।
  4. अन्तर्मुखी पुरुषार्थ बढ़ाएँ ।
  5. विपरीत सोच, स्थूल उपयोग, शिथिल चर्या एवं गंदा रहन-सहन व्यक्तित्व के लिए कलंक है ।
  6. ज्ञानी पापों की अनुमोदना भी नहीं करते । भले गृहस्थदशा में पाप नहीं छूट पाते तो भी ज्ञानी उनकी निन्दा, गर्हा और उनसे निवृत्ति के लिए निरन्तर सहज निष्पाप निज शुद्धात्मा को ही भाते-भाते आत्मामय अर्थात निष्पाप हो जाते हैं ।
  7. आत्मन ! निन्दा के लिए अपने दोष ही बहुत हैं । तुझे पराई निन्दा से अपयश, क्लेश और दुर्गति के अतिरिक्त क्या मिलेगा ?
  8. ध्यान रहे ! परिग्रह की अनुमोदना भी न हो जाये ।
  9. विषयों का स्थूल रूप से त्याग कर देने पर भी अन्तर में तत्त्वज्ञान के अभ्यास बिना कषायें नहीं मिटती ।
  10. छोटे-छोटे प्रसंगों में झूठ अर्थात अयथार्थ या अहितकारी और निंद्य वचन बोलना कदापि उचित नहीं है ।
  1. शाश्वत जीवत्व शक्ति से अपना जीवन मानते हुए निर्भय रहना ही हितकर है । इन्द्रियादि प्राणों से अपना जीवन मानते हुए इन्हीं के पोषण में लगे रहकर निरन्तर भयभीत रहना तो अन्याय है ।
  2. स्वभाव के आश्रय से शुद्ध ज्ञान, आनन्द, प्रभुतादि रूप परिणमना ही श्रेयस्कर है । परलक्ष्य से अशुद्ध परिणमन करना तो मूढ़ता है ।
  3. मिथ्या पक्षपात से तो क्लेश ही होता है ।
  4. भेदविज्ञान पूर्वक ही स्वाधीन, सुखमय जीवन होता है ।
  5. पंचेन्द्रिय भोगों में आसक्त जीव तो हर समय असंतुष्ट और दुःखी रहता है ।
  6. अपने उदय जनित प्रतिकूलता को समता सहते हुए एवं तत्त्वविचार करते हुए अन्तर्मुखी होना ही सुखकर है ।
  7. पर के सन्मुख दीनतापूर्वक याचना करना और सहयोग के लिए गिड़गिड़ाना लोक में भी निंद्य है ।
  8. प्रत्येक द्रव्य का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और स्वतंत्र ही प्रभुत्व है ।
  9. भो आत्मन ! दूसरों के द्वारा तेरी बात मान लेने और तेरे अनुकूल प्रवर्तने से तेरी प्रभुता नहीं है । तेरी प्रभुता तो तेरे ही वीतराग परिणाम से प्रगट होती है ।
  10. पराश्रय तेरे विकास में बाधक है ।
  1. निज ध्रुव परमात्मा की आराधना से ज्ञान परिणति में ऐसी स्वच्छता प्रगट होती है जिसमें लोकालोक सहज ही झलक जाता है फिर शरीर भी मल-मूत्रादि गन्दगी से रहित स्वयमेव हो जाता है और अल्पकाल में परम निर्मल अशरीरी सिद्धदशा प्रगट हो जाती है ।
  2. दूसरों के पुण्यजनित वैभव, शक्ति, प्रभुता, क्षायोपशमिक ज्ञान आदि को देखकर न आश्चर्य करो, न प्रभावित हो । ये सब क्षणभंगुर हैं । अन्तर्मुख हो अपना वैभव निहारते हुए प्रसन्न रहो ।
  3. अज्ञान में विस्मय होता है, ज्ञान में आनन्द ।
  4. विश्व में ज्ञान प्रकाश ही सर्वोत्कृष्ट है जो स्वयं से प्रकाशमान है । अतः स्वाधीन, शाश्वत और आनन्दमय है ।
  5. जहाँ ज्ञानमय प्रकाश होता है वहाँ मोहान्धकार नहीं रह सकता ।
  6. शुद्धात्मा परम निरपेक्ष है अतः आत्मा के आश्रय से ही निरपेक्ष रहा जा सकता है ।
  7. जैसे भगवान के बिना मन्दिर वैसे ही भावलिंग के बिना द्रव्यलिंग की प्रतिष्ठा नहीं होती ।
  8. पर्याय की तत्समय की योग्यता ही नियामक कारण है । उस समय निमित्त पर कारणपने पर आरोप होता है और व्यवहार नय से कहा जाता है - ‘यह कार्य इसके द्वारा किया गया’, परन्तु कर्तृत्व का अहंकार मिथ्या है ।
  9. प्रशंसा दूसरे की हो सकती है परन्तु समर्पण अपनत्व होने पर ही संभव है । अतः आत्मा को ‘अहंपना’ समझना ही सर्वप्रथम कर्त्तव्य है ।
  10. आत्मा की आराधना आत्मा में अहंपना भासित होने पर ही संभव है ।
  1. वस्तु अनेकान्तमय है अतः अस्ति-नास्ति पूर्वक ही समझना चाहिए । जैसे - मैं आत्मा हूँ, अनात्मा (शरीरादि) नहीं । मैं ज्ञानस्वभावी हूँ, अज्ञान मेरा स्वभाव नहीं । मैं सुख स्वभावी हूँ अतः दुःख मेरा स्वभाव नहीं है । मैं समता स्वभावी हूँ अतः कषाय मेरा स्वभाव नहीं है । मैं स्वच्छ्त्व स्वभावी हूँ मलिनता मेरा स्वभाव नहीं । में प्रभुता स्वभावी हूँ पामरता मेरा स्वभाव नहीं ।
    ऐसा समझकर मोह, अज्ञान, कषाय, दुःख, पामरता का अभाव करने के लिए मात्र निज स्वभाव का आश्रय ही इष्ट है, बाहर भटकना व्यर्थ है ।
  2. भगवान के समीप ‘मैं भगवान हूँ’ ऐसे अहंकारपूर्वक नहीं आया जाता अपितु भक्ति एवं विनयपूर्वक भगवान बनने के लिए अर्थात आत्मप्रभुता प्रगट करने के लिए आना चाहिए ।
  3. गुरु के निकट गुरुता के अहंकार पूर्वक अर्थात ‘मैं भी कुछ हूँ’ ऐसा समझकर नहीं आयें, सदैव लघुतापूर्वक आत्मीक गुरुता प्रगट करने के लिए आयें ।
  4. गुरुजनों के समीप समझाने नहीं, समझने के लिए विनम्रता पूर्वक ही आयें ।
  5. दर्शन का अर्थ श्रद्धान और अवलोकन है अतः सम्यक श्रद्धापूर्वक अवलोकन करना ही देवदर्शन है ।
  6. मोही स्वयं सुखी होने में भी समर्थ नहीं है और निर्मोही का दर्शन, उपदेश, सत्संग भी जगत के सुख में निमित्त हैं ।
  7. अपनी शक्ति एवं बुद्धि को पापों से बचाओ और साधना में लगाओ ।
  8. बाह्य साधना का भी मूलाधार अंतरंग साधना अर्थात विवेक और भावों की पवित्रता है ।
  9. कर्मोदय में होने वाली अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं को समता से सहन करना अर्थात उनमें न अभिमानी होना, न दीन होना, न स्वच्छन्द होना न प्रमादी होना, न लुब्ध होना, न क्षुब्ध होना यह निर्जरा का कारण है ।
  10. जिनके ह्रदय में भगवन्तों और गुरुजनों के प्रति सम्यक श्रद्धा और भक्ति होती है उनका जीवन सहज ही पवित्र, सुखी और प्रशंसनीय होता है ।
  1. मोही जिसे देखकर पागल हो जायें, ऐसा रूप भी शील के बिना प्रशंसनीय नहीं वैसे ही भेदविज्ञान के बिना जगत को विस्मय उत्पन्न करने वाला क्षायोपशमिक ज्ञान भी कदापि प्रशंसनीय नहीं हो सकता ।
  2. जैसे लोक में भी शील ही प्रशंसनीय कहा जाता है वैसे ही मुक्तिमार्ग में स्वानुभव ही पूज्यनीय, प्रशंसनीय और आनन्दमय है ।
  3. हे प्रभो ! आपके रहते हुए मैं आत्मा को पामर कैसे मानूँ ? इन्द्रिय सुख को सुख कैसे मानूँ ?
    हे वीतरागी ! अपने को मलिन (मोही, रागी, द्वेषी) स्वभाव वाला कैसे मानूँ ?
    हे सर्वज्ञ ! अपने को अज्ञानी या अल्पज्ञान स्वभाव वाला कैसे मानूँ ?
    हे अनन्तवीर्यवान ! आपके रहते हुए मैं आत्मा को कमजोर कैसे मानूँ ?
  4. विचारें ! कितना समय खेलकूद, खाने-पीने, सोने, विकथा, धन कमाने, परिग्रह सम्हालने, भोगों आदि में निकल गया । अब तो जिनवर द्वारा दर्शाये शुद्धात्मा की आराधना में लगें जिससे परमार्थ सुख मिले और क्लेशों की परम्परा का अन्त हो ।
  5. भो आत्मन ! वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा कर, भक्ति कर, जिनवचनों का अभ्यास कर, अंतरंग में बारंबार विचार कर, वैराग्य भावना में उपयोग लगा । बाहर में सब ऐसा ही चलता रहेगा । अपनी परिणति को समेट, निरपेक्ष रहने का प्रयत्न कर, सहनशीलता बढ़ा, समता भाव के बिना सुखी होने का कोई उपाय नहीं है ।
  6. पापोदय में कोई सहाय नहीं कर सकता । तुम अन्य की सहाय की अपेक्षा ही मत रखो । अपनी इच्छाओं को घटाते जाओ, स्वावलम्बी बनो अर्थात बिना बाह्य साधनों के ही इष्ट-अनिष्ट की कल्पना छोड़कर सुखी रहने का अभ्यास करो । विचारो ! तुम्हारे पुण्योदय से अधिक अनुकूलतायें कैसे संभव हैं ? मार्ग (समता) से च्युत न होने के लिए तो परीषह सहन करने होंगे । महापुरुषों ने भी परीषहों में समता रखते हुए साधना की है ।
  7. परद्रव्यों को अपनी इच्छा के अनुकूल बनाकर कोई सुखी नहीं हुआ फिर तुम असंभव कल्पना करके अपने क्लेश को क्यों बढ़ाते हो ?
  8. मिथ्या मोह को छोड़ना ही सम्यक उपाय है । सत्य तो यह है कि तुम भी किसी अन्य के लिए कुछ भी नहीं कर पाओगे । अतः व्यर्थ विकल्पों को छोड़ो ।
  9. कोई भी तुम्हारे कर्मोदय से अधिक अनुकूलतायें या प्रतिकूलतायें नहीं दे सकता । पर के लक्ष्य से राग-द्वेष करना महाक्लेशकारी है ।
  10. दूसरों का दोष देखने वाले को अपना दोष समझ में ही नहीं आता, तब उसे दूर करने का उद्यम कैसे हो सकता है और अपना दोष मिटे बिना अपना दुःख दूर होना असंभव है ।
    सावधान ! पर को अपना मानना, पर का दोष देखना या पर की आशा करना छोड़कर ही सुखी हुआ जा सकता है, अन्यथा संक्लेश ही बढ़ेगा ।
  1. पंचमकाल की इस विनय-वात्सल्य शून्य स्वार्थ, ईर्ष्या, अहंकार पूर्ण व्यवस्था को भी माध्यस्थ भाव से स्वीकार ही करना होगा । बाहर से अपना उपयोग समेटना ही होगा । शान्ति अंतरंग में ही वीतराग भाव की साधना करने से मिलेगी ।

  2. शास्त्र में तो मात्र संकेत हैं । संकेतानुसार मार्ग का निर्णय करते हुए अंतरंग में पुरुषार्थ करना है ।

वस्तुस्वरूप का विचार करते हुए बीच में मोह की मंदता होने से शुभभाव भी आयेंगे । पुण्योदयजनित अनुकूलताएँ भी आयेंगी जिनमें सुख-सा लगेगा परन्तु उनमें भ्रमित न होते हुए, न अटकते हुए, उपयोग को अन्तर्मुख करते हुए ज्ञानमात्र ध्रुव स्वरूप को लक्ष्य करना ही है । बिना स्वानुभव के विश्राम नहीं । उतावलापन, आकुलता भी न हो और प्रमाद भी न हो ऐसे सन्तुलन, धैर्य, पुरुषार्थ पूर्वक आत्माराधना करना ही सम्यक उपाय है ।

  1. जैसे हीरों की खान में खुदाई करते हुए मिट्टी पत्थर आदि मिलते हैं । गहरे उतरने में कठिनाइयाँ बढ़ती जाती हैं परन्तु साहस, विश्वास और उत्साह पूर्वक खोदते जाते हैं और गहरे-गहरे उतरते जाते हैं अन्ततः हीरों को प्राप्त कर ही लेते हैं । वैसे ही स्वाध्याय, तत्त्वविचार पूर्वक गहरे उतरते हुए, उपयोग की एकाग्रता बढ़ाते हुए शुद्ध रत्नत्रय को प्राप्त करें ।

  2. मिथ्यादर्शन को आत्मश्रद्धान, अज्ञान को सम्यग्ज्ञान व कषायों और कामनाओं को तत्त्वविचार एवं आत्मध्यान के अभ्यास से ही जीता जा सकता है ।

  3. आत्मश्रद्धान और आत्मभावना से आत्मबल सहज ही प्रगट होता जाता है निर्भयता सहज ही वर्तती है ।

  4. क्रमबद्ध परिणमन का मिथ्या विचार कर आत्महित में प्रमादी होना और विषयों में उलझे रहना भी स्वच्छन्दता ही है ।

  5. दृढ़ संकल्पशक्ति व योग्य व्रत लेकर ही, अविरति और प्रति समय अंतरंग उत्साह और सतत सावधानी पूर्वक स्वरूप साधना में प्रवर्तन से ही प्रमाद को जीता जा सकता है । जैसे लौकिक में भी लक्ष्य प्राप्ति के लिए उत्साह पूर्वक प्रवर्तन होने पर प्रमाद स्वयं दूर हो जाता है ।

  6. जैसे अकृतपुण्य के द्वारा खीर माँगने पर भी न देने के कारण श्रेष्ठी-पुत्रों के प्रति अन्तरंग में द्वेष भाव वर्तने से ऐसा कर्मबन्ध हुआ कि धन्यकुमार के भव में उसके मन में दुर्भाव न होने पर भी उसके भाइयों के मन में उसके प्रति ईर्ष्या और द्वेष होता था ; जिससे खिन्न होकर उसे घर छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा । अतः मन में भी कभी किसी के प्रति द्वेष मत रखना । भवितव्य और अपने उदय का विचार कर समता ही रखना श्रेयस्कर है ।

  7. शरीर, रागादि सहित जीव का अनुभव तो सभी अज्ञानी करते ही हैं । देहादि से भिन्न ज्ञानानन्द स्वभावी ध्रुव आत्मा का अनुभव करने वाले विरले ज्ञानी ही हैं । जैसे छिलके रहित चावल का आस्वादन करने वाले मनुष्य विरले ही हैं ।

  8. पुण्योदय से बड़ा और पापोदय में हीन मानने वाले तो बहुत हैं परन्तु कर्मोदय से निरपेक्ष देखने वाले ज्ञानी विरले हैं ।

  1. स्थूल पापों को छोड़कर स्थूल पुण्य की क्रियाओं में संतुष्ट हो जाने वाले तो बहुत हैं परंतु भेद ज्ञान पूर्वक आत्म-आराधना करने वाले दुर्लभ हैं ।

  2. पर द्रव्यों को दुख-सुख का कारण मानकर आर्त्त-रौद्र ध्यान करने वाले तो बहुत हैं परंतु अपने मोह (मिथ्यात्व, कषाय) को दुख का कारण मानकर उसे मिटाने के लिए ज्ञानाभ्यास करने वाले विरले हैं ।

  3. विकल्प के अनुकूल परद्रव्यों का परिणामन देखकर कर्तृत्व का अहंकार करने वाले तो बहुत हैं परंतु स्वयं स्वाधीन होते हुए परिणमन को भिन्न समझकर अकड़ का ज्ञाता रहने वाले ही अंतरात्मा हैं ।

  4. मोक्ष मार्ग को कठिन और कष्ट कर समझकर भोगों में ही मग्न रहने वाले मोही तो बहुत हैं किंतु मोक्ष मार्ग को आनंदमय समझते हुए रत्नत्रय धारी ज्ञानी विरले ही हैं ।

  5. भगवान और गुरुओं को प्रसन्न करके कामनाओं की पूर्ति करने की मान्यता वाले भोले जीव तो बहुत हैं परंतु उनके वीतराग स्वरूप का निर्णय करके उनकी साक्षी में मोक्षमार्ग साधने वाले धर्मात्मा विरले ही हैं ।

  6. आत्मा को रागादि आस्रवों से भिन्न जाने बिना आस्रवों का अभाव नहीं होता । जब जीव स्वयं को आस्रवों से भिन्न एक, नित्य उद्योतरूप, विज्ञानघन, कारकों की प्रक्रिया से पार अर्थात -

(a). किसी से उत्पन्न होने वाला और न किसी को उत्पन्न करने वाला ।
(b). न किसी का साधन और न किसी का साध्य ।
©. न किसी से कुछ लेने वाला और न किसी को कुछ देने वाला ।

  • एक ज्ञान रूप ही स्वयं में शहद पने परिपूर्ण रहने वाला आत्मा अनुभव करता है । तब सहज अद्भुत तृप्ति होने से क्रोधादि भावों का आविर्भाव ही नहीं होता तब कर्म बंद सहज ही नहीं होता ।
  1. जीव ज्ञान रूप हो अपना परिणमन कर रहा है और पुद्गलादि ज्ञानवान ना होने पर भी अपना परिणमन कर रहे हैं, उन्हें अपना परिणमन करने के लिए ज्ञान की जरूरत नहीं है ।

  2. निज की शरण ही जागरण है ।

  3. निवृत्तिमय जीवन में प्रवृत्तिमय जीवन (विषयों में प्रवृत्तिरूप) सुहाता ही नहीं ।

  4. शारीरिक चेष्टाएँ - जड़ की क्रिया ।
    मोह-राग-द्वेष - अधर्म की क्रिया ।
    सम्यकदर्शनज्ञानचारित्र - धर्म की क्रिया ।

  1. आत्मा असाधारण तत्त्व है, उसकी चर्चा भी असाधारण है । सर्वोत्कृष्ट परमात्माओं द्वारा कही गई है । अतः अपूर्व रुचि से ही ह्रदयंगम होगी । साधारण रुचि से काम नहीं चलेगा ।

  2. हाथ में कोयला या पत्थर रखकर चिन्तवन करने से कुछ हाथ नहीं लगेगा परन्तु चिन्तामणि रख कर चिन्तवन करते ही इच्छित वस्तु की प्राप्ति होगी । वैसे ही चैतन्य चिन्तामणि आत्मा को ज्ञान का विषय बनाते ही सुख की प्राप्ति सहज हो जायेगी ।

  3. जैसे आम के वृक्ष से निबौरी उत्पन्न नहीं हो सकती उसी प्रकार आत्म स्वभाव में विकार उत्पन्न करने की शक्ति नहीं है ।

  4. वस्तु के स्वभाव में भूल नहीं है, भूल मात्र दृष्टि में है ।

  5. अहं की भावना में बुद्धि कुण्ठित हो जाती है ।

  6. अंतरंग के सच्चे पश्चाताप से कलुषता अविलम्ब धुल जाती है ।

  7. केवल कल्पनाओं से सुख की उपलब्धि नहीं होती ।

  8. लोक निर्मम है, सत्य से कोसों दूर है, यहाँ सत्य की अर्थी जलती है ।

  9. अजितेन्द्रिय के समस्त धार्मिक अनुष्ठान गजस्नानवत् है ।

  10. आत्मानुभूति ही चैतन्यतरू का सुफल है ।

  1. सम्यग्दर्शन भी अध्यात्म पद्धति से देखा जाए तो आत्मा से बाह्य तत्त्व (संवर तत्त्व) है । आगम पद्धति से ‘आत्मा का है’ - ऐसा कहा जाता है । सच बात तो यहै कि सम्यग्दर्शन का तो पूर्ण समर्पण ध्रुव को है । जहाँ उसके व्यक्तिगत अंश के लिए कोई गुंजाइश नहीं ।

  2. निज ज्ञानस्वभाव ही आत्मा का आसन है ।

  3. जो ज्ञानस्वभाव की ओर ले जाए उसे न्याय कहते हैं और जो पर की ओर ले जाए उसे अन्याय कहते हैं ।

  4. सम्यक्त्वी तो व्यवहार से निवृत्तिस्वरूप है ।

  5. स्वर्ग के देव को नरक का दुःख नहीं, नारकी को स्वर्ग का सुख नहीं और आत्मा में इन समस्त विकारों का अस्तित्व नहीं ।

  6. स्वभाव के आश्रयी को परास्त करने में कोई समर्थ नहीं क्योंकि उसके मोह का अभाव है ।

  7. शूरवीर वही है जो न्याय का पक्ष ले ।

  8. दुःखमय निराशा अज्ञान का परिणाम है, सुखमय निराशा (आशा रहित) ज्ञान का फल है ।

  9. आवागमन (विकल्पों) में शान्ति नहीं, संसार है ।

  10. स्व को ग्रहण करे उसे ही परमार्थ से तीक्ष्णबुद्धि कहते हैं ।

  1. असंतोष पराजय का दूसरा नाम है ।

  2. सच बात तो यह है कि नेमिकुमार ने शादी के समय पशुओं को बंधन से मुक्त नहीं किया उन्होंने तो स्वयं को राग के बंधन से मुक्त किया था, पशु अपनी योग्यता से मुक्त हुए थे ।
    पशुओं को बंधन में देखकर नेमिकुमार विचारते हैं कि, “ये पशु मेरे विवाह के लिए नहीं अपितु वैराग्य के लिए इकट्ठे किये गये हैं ।”

  3. मानी, ऊँट की पर्याय में जाता है जो ऊपर ही देखता रहता है परन्तु पहाड़ के नीचे आने पर नीचा देखना पड़ता है ।

  4. अज्ञानी कंजूस कोयले के समान है जिस पर गुरुओं के उपदेश का रंग नहीं चढ़ता ।

  5. ‘मैंने अमुक पर उपकार किया’ - ऐसा विचार करना भी अपराध है । ‘मैं किस का श्रेय कर रहा हूँ ?’ - ऐसा विकल्प भी अभिमान है ।

  6. लोकेषणा आत्म-कल्याण का समूल गात करने वाली जानकर त्यागो ।

  7. वैष्णवों में लक्ष्मी की सवारी उल्लू मानी गयी है - इसका अर्थ यह है कि जिसको लक्ष्मी का भूत सवार हो जाता है वह उल्लू के समान दिन (ज्ञान-प्रकाश) में अंधा और अज्ञान के अंधकार में गतिशील हो जाता है ।

  8. आत्मा में रुचि लग जावे, उपयोग रम जावे, ऐसा अतीन्द्रिय आनन्द भरा है जबकि पर में शान्ति का नाम भी नहीं अतः जिसे आत्मबोध हुआ उसे पर में रुचि आती नहीं और स्व से रुचि छूटती नहीं ।

  9. राग प्रशस्त नहीं होता, राग का विषय प्रशस्त (देव-शास्त्र-गुरु-निज तत्त्व आदि) होने से राग को उपचार से प्रशस्त कहते हैं ।

  10. आगम की आज्ञा की अवहेलना करते हुए स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति अर्थात विषय-कषायों की पूर्ति में ही तल्लीन रहना, उन्हीं की पुष्टि करना, धर्म साधना के लिए होनहार व कर्म का बहाना बनाना, क्रियाकाण्ड में सन्तुष्ट होना, ‘भरतादि ज्ञानी भी भोगों में रहते थे’ - ऐसा उदाहरण देते हुए स्वयं भोगों में फँसे रहने पर भी धर्मात्मा मानना स्वच्छन्दता है ।