47 शक्तियाँ । 47 Shaktiyan

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समयसार ग्रन्थ की आत्पख्याति टीका के परिशिष्ट में वर्णित 47 शक्तियाँ -

1. आत्मद्रव्यके कारणभूत ऐसे चैतन्यमात्र भावका धारण जिसका लक्षण अर्थात् स्वरूप है ऐसी जीवत्वशक्ति
2. अजड़त्वस्वरूप चितिशक्ति
3. अनाकार उपयोगमयी दृशिशक्ति
4. साकार उपयोगमयी ज्ञानशक्ति
5. अनाकुलता जिसका लक्षण अर्थात् स्वरूप है ऐसी सुखशक्ति
6. स्वरूपकी रचनाकी सामर्थ्यरूप वीर्यशक्ति
7. जिसका प्रताप अखण्डित है अर्थात् किसीसे खण्डित की नहीं जा सकती ऐसे स्वातंत्र्यसे शोभायमानपना जिसका लक्षण है ऐसी प्रभुत्वशक्ति
8. सर्व भावोंमें व्यापक ऐसे एक भावरूप विभुत्वशक्ति
9. समस्त विश्वके सामान्य भावको देखनेरूपसे परिणमित ऐसे आत्मदर्शनमयी सर्वदर्शित्वशक्ति
10. समस्त विश्वके विशेष भावोंको जाननेरूपसे परिणमित ऐसे आत्मज्ञानमयी सर्वज्ञत्वशक्ति
11. अमूर्तिक आत्मप्रदेशोंमें प्रकाशमान लोकालोकके आकारोंसे मेचक (अर्थात् अनेक-आकाररूप) ऐसा उपयोग जिसका लक्षण है ऐसी स्वच्छत्वशक्ति
12. स्वयं प्रकाशमान विशद (स्पष्ट) ऐसी स्वसंवेदनमयी प्रकाशशक्ति
13. क्षेत्र और कालसे अमर्यादित ऐसी चिद्विलासस्वरूप (चैतन्यके विलासस्वरूप) असंकुचितविकासत्वशक्ति
14. जो अन्यसे नहीं किया जाता और अन्यको नहीं करता ऐसे एक द्रव्यस्वरूप अकार्यकारणत्वशक्ति
15. पर और स्व जिनके निमित्त हैं ऐसे ज्ञेयाकारों तथा ज्ञानाकारोंको ग्रहण करनेके और ग्रहण करानेके स्वभावरूप परिणम्यपरिणामकत्व शक्ति
16. जो कमबढ़ नहीं होता ऐसे स्वरूपमें नियतत्वरूप (निश्चित्तया यथावत् रहनेरूप) त्यागोपादानशून्यत्वशक्ति
17. षट्स्थानपतित वृद्धिहानिरूपसे परिणमित, स्वरूप-प्रतिष्ठत्वके कारणरूप (वस्तुके स्वरूपमें रहनेके कारणरूप) ऐसा जो विशिष्ट (खास) गुण है उस-स्वरूप अगुरुलघुत्व शक्ति
18. क्रमप्रवृत्तिरूप और अक्रमप्रवृत्तिरूप वर्त्तन जिसका लक्षण है ऐसी उत्पादव्ययध्रुवशक्ति
19. द्रव्यके स्वभावभूत ध्रौव्य-व्यय-उत्पादसे आलिंगित (स्पर्शित), सदृश और विसदृश जिसका रूप है ऐसे एक अस्तित्वमात्रमयी परिणामशक्ति
20. कर्मबन्धके अभावसे व्यक्त किये गये, सहज, स्पर्शादि-शून्य ऐसे आत्मप्रदेशस्वरूप अमूर्तत्त्वशक्ति
21. समस्त, कर्मों के द्वारा किये गये, ज्ञातृत्वमात्रसे भिन्न जो परिणाम उन परिणामोंके करणके उपरमस्वरूप (निवृत्तिरूप, अभावरूप) अकर्तृत्वशक्ति
22. समस्त, कर्मोंसे किये गये, ज्ञातृत्वमात्रसे भिन्न परिणामोंके अनुभवके (भोक्तृत्वके) उपरमस्वरूप अभोक्तृत्वशक्ति
23. समस्त कर्मोंके उपरमसे प्रवृत्त आत्मप्रदेशोंकी निष्पन्दतास्वरूप (अकम्पतास्वरूप) निष्क्रियत्वशक्ति
24. जो अनादि संसारसे लेकर संकोचविस्तारसे लक्षित है और जो चरम शरीरके परिमाणसे कुछ न्यून परिमाणसे अवस्थित होता है ऐसा लोकाकाशके माप जितना मापवाला आत्म-अवयवत्व जिसका लक्षण है ऐसी नियतप्रदेशत्वशक्ति
25. सर्व शरीरोंमें एकस्वरूपात्मक ऐसी स्वधर्मव्यापकत्वशक्ति
26. स्व-परके समान, असमान और समानासमान ऐसे तीन प्रकारके भावोंके धारणस्वरूप साधारण-असाधारण-साधारणासाधारणधर्मत्वशक्ति
27. विलक्षण अनन्त स्वभावोंसे भावित ऐसा एक भाव जिसका लक्षण है ऐसी अनन्तधर्मत्वशक्ति
28. तद्रूपमयता और अतद्रूपमयता जिसका लक्षण है ऐसी विरुद्धधर्मत्वशक्ति
29. तद्रूप भवनरूप ऐसी तत्त्वशक्ति
30. अतद्रूप भवनरूप ऐसी अतत्त्वशक्ति
31. अनेक पर्यायोंमें व्यापक ऐसी एकद्रव्यमयतारूप एकत्वशक्ति
32. एक द्रव्यसे व्याप्य जो अनेक पर्याये उस-मयपनेरूप अनेकत्वशक्ति
33. विद्यमान-अवस्थायुक्ततारूप भावशक्ति
34. शून्य (अविद्यमान) अवस्थायुक्ततारूप अभावशक्ति
35. भवते हुए (प्रवर्त्तमान) पर्यायके व्ययरूप भावाभावशक्ति
36. नहीं भवते हुए (अप्रवर्त्तमान) पर्यायके उदयरूप अभावभावशक्ति
37. भवते हुए (प्रवर्तमान) पर्यायके भवनरूप भावभावशक्ति
38. नहीं भवते हुये (अप्रवर्तमान) पर्यायके अभवनरूप अभावाभाव शक्ति
39. (कर्त्ता, कर्म आदि) कारकोंके अनुसार जो क्रिया उससे रहित भवनमात्रमयी (होनेमात्रमयी)
भाव-शक्ति
40. कारकोंके अनुसार परिणमित होनेरूप भावमयी क्रियाशक्ति
41. प्राप्त किया जाता जो सिद्धरूप भाव उसमयी कर्मशक्ति
42. होनेपनरूप और सिद्धरूप भावके भावकत्वमयी कर्तृशक्ति
43. भवते हुये (प्रवर्तमान) भावके भवनके (होनेके) साधकतमपने-मयी (उत्कृष्ट साधकत्वमयी, उग्र
साधनत्वमयी) करणशक्ति
44. अपने द्वारा दिया जाता जो भाव उसके उपेयत्वमय (उसे प्राप्त करनेके योग्यपनामय, उसे
लेनेके पात्रपनामय) सम्प्रदानशक्ति
45. उत्पादव्ययसे आलिंगित भावका अपाय (हानि, नाश) होनेसे हानिको प्राप्त न होनेवाले ध्रुवत्वमयी अपादानशक्ति
46. भाव्यमान (अर्थात् भावनेमें आते हुये) भावके आधारत्वमयी अधिकरणशक्ति
47. स्वभावमात्र स्व-स्वामित्वमयी सम्बन्धशक्ति (अपना भाव अपना स्व है और स्वयं उसका स्वामी है - ऐसे सम्बन्धमयी सम्बन्ध-शक्ति)।
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आचार्य कुंदकुंद देव ने समयसार जी की दूसरी गाथा में समय अर्थात जीव का स्वरूप प्रतिपादित किया है। आचार्य देव कहते हैं वह जीव नामक पदार्थ -
१- उत्पाद- व्यय- ध्रौव्य की एकता रूप अनुभूति जिस का लक्षण है ऐसी सत्ता सहित है और

२- नित्य उद्योतरूप निर्मल स्पष्ट दर्शन- ज्ञान ज्योति स्वरूप है इसकी चर्चा हम ने कल की ।

अब टीकाकार आगे कहते हैं कि -
मानो हमारे लिए प्रश्न हो कि वह जीव नामक पदार्थ अस्तित्ववान है और ज्ञान- दर्शन स्वभावी है तो क्या वह जीव नामक पदार्थ मात्र ज्ञान- दर्शन स्वरूप ही है, उसमें अन्य कोई गुण नहीं हैं क्या ?
तो आचार्य देव कहते हैं ३- वह जीव अनंत धर्मों में रहने वाला जो एक धर्मीपना है उसके कारण जिसे द्रव्यत्व प्रगट है
अनंत धर्मात्मक वस्तु को ही द्रव्य कहते हैं ।
प्रत्येक द्रव्य में अनंत गुण-धर्म -शक्तियां पाए जाते हैं जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता है लेकिन हम अनुमान से समझ सकते हैं ।

एक वस्तु में अनंत गुण-धर्म होने की क्या आवश्यकता है ?

तो यहां हमें समझना चाहिए कि जैसे लोक में किसी भी सभ्य /संभ्रांत नागरिक के घर में वह हर वस्तु होती है जो उसके काम में आती है भले वह वस्तु साल -2 साल -5 साल में भी काम आवे तो भी उसके घर में वह वस्तु होती है जिससे कि उसे कभी भी अपना कार्य करने के लिए किसी से कुछ मांगना ना पड़े इसी तरह के जीव में स्वाभाविक रूप से ऐसी अनंत शक्तियां विद्यमान हैं, गुणधर्म विद्यमान हैं जिनके कारण कभी भी जीव को या अन्य किसी द्रव्य को किसी अन्य द्रव्य से किसी भी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखनी पड़ती है । अपना कार्य करने में प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है । अनादि काल से आज तक जीव ने सर्वज्ञ दशा प्राप्त नहीं की परंतु जब भी उसे सर्वज्ञता प्रकट करना हो तो सर्वज्ञत्व शक्ति विद्यमान हैं उसे किसी से मांगना नहीं पड़ेगा ।
सुख शक्ति है, सुख मांगना नहीं पड़ेगा। परिणमन करने के लिए वस्तुत्व/द्रव्यत्व गुण हैं किसी अन्य की अपेक्षा नहीं है, तो सत्ता टिकाए रखने के लिए भी अस्तित्व गुण है, अन्य किसी की अपेक्षा नहीं है। ऐसे अनंत धर्मों का एक स्वामी, एक धर्मी, द्रव्य धर्मी है और उसके अनंत धर्म -गुण- विशेषताएं -शक्तियां उसमें समाहित हैं ऐसा जिसके द्रव्यपना प्रगट हो गया है ऐसा वह जीव नामक पदार्थ है

यह सभी गुण -धर्म और पर्याय द्रव्य में किस प्रकार रहती हैं ?

तो आचार्य देव कहते हैं -
४- वह जीव नामक पदार्थ क्रम रूप और अक्रमरूप में प्रवर्तमान अनेक भाव जिसका स्वभाव होने से जिसने गुण -पर्यायों को अंगीकार किया है ऐसा है
जीव नामक पदार्थ में अर्थात मुझ में क्रम से रहने वाली, प्रकट होने वाली पर्याय होती हैं तो अक्रम से अर्थात् एक साथ रहने वाले अनंत गुण भी विद्यमान हैं।

गुणों को अक्रमवर्ती या सहवर्ती कहा जाता है । क्योंकि सभी गुण एक साथ प्रत्येक प्रदेश पर विद्यमान रहते हैं । उनमें कोई ऐसा क्रम नहीं है कि पहले ज्ञान, फिर दर्शन, फिर सुख इत्यादि । सभी गुण असंख्य प्रदेश में फैले हुए हैं, पसरे हुए हैं एक साथ रह रहे हैं । इसलिए उनको सहवर्ती या अक्रमवर्ती कहते हैं ।
जो पर्याय होती हैं, गुणों का परिणमन/कार्य होता है वह सभी क्रम -क्रम से, एक के बाद एक, एक के बाद एक होता है । एक साथ एक गुण की सभी पर्याय नहीं होती हैं। इसलिए उन पर्यायों को क्रमवर्ती कहा जाता है ।
यहां यह ध्यान रखें कि गुणकी एक- एक समय में एक पर्याय होती है। अनंत गुणों की तो एक-एक पर्याय हर समय ही हो रही है, परंतु 1-1 गुण की अपेक्षा हैं तो वह क्रमवर्ती कहलाती हैं । ऐसे अनंत गुण- पर्यायमयी जीव नामक पदार्थ है।

आचार्य उमास्वामी देव ने गुणपर्ययवद् द्रव्यम् कहा है तो मानो टीकाकार आचार्य देव ने सूत्र के अनुसार जीव नामक पदार्थ की विशेषता बतलाई है ।

यहाँ हम अगुरुलघुत्व गुण की षट्गुणी वृद्धिहानि के विषय में विचार कर रहे हैं। श्री धवलासार जी के आधार से इनका संक्षिप्त स्वरूप कुछ इसप्रकार आगम में बताया गया है —

१. अनन्तभागवृद्धि :- अनन्त गुणों में से एक गुण की पर्याय का जो उत्पाद , वह अनन्तभागवृद्धि है।

२. असंख्यातभागवृद्धि :- असंख्यात गुणों की अपेक्षा एक गुण की पर्याय का जो उत्पाद है , वह असंख्यातभागवृद्धि है।

३. संख्यातभागवृद्धि :- संख्यात गुणों की अपेक्षा एक गुण की पर्याय का जो उत्पाद है , वह संख्यातभागवृद्धि है।

४. संख्यातगुणवृद्धि :- ८ (संख्यात) गुणों में से ८(संख्यात) पर्याय का उत्पाद हुआ , वह संख्यातगुणवृद्धि है।

५. असंख्यातगुणवृद्धि :- असंख्यात गुणों में असंख्याती पर्यायों का उत्पाद हुआ , वह असंख्यातगुणवृद्धि है।

६. अनन्तगुणवृद्धि :- अनन्त गुणों की अनन्ती पर्यायों का उत्पाद हुआ , वह अनन्तगुणवृद्धि है।

[उसी समय (वृद्धि के समय) षट्स्थान हानि भी होती है -]

१. अनन्तभागहानि :- व्यय की अपेक्षा अनन्त गुणों की अपेक्षा एक गुण की पर्याय का व्यय अनन्तभागहानि है।

२. असंख्यातभागहानि :- असंख्यात गुणों की अपेक्षा एक गुण की पर्याय का व्यय , वह असंख्यातभागहानि है।

३. संख्यातभागहानि :- संख्यात गुणों की अपेक्षा एक गुण की पर्याय का व्यय , वह संख्यातभागहानि है।

४. संख्यातगुणहानि :- एक गुण की पर्याय के व्यय की अपेक्षा १०० गुणों की पर्याय का व्यय , वह संख्यातगुणहानि है।

५. असंख्यातगुणहानि :- एक गुण की पर्याय के व्यय की अपेक्षा असंख्यात गुणों की पर्याय का व्यय , असंख्यातगुणहानि है।

६. अनन्तगुणहानि :- एक गुण की पर्याय के व्यय की अपेक्षा अनन्त गुणों की पर्याय का व्यय , वह अनन्तगुणहानि है।

               षट्स्थानपतित वृद्धि-हानिरूप से परिणमित और स्वरूपप्रतिष्ठितपने के कारणरूप जो विशिष्ट गुण है , उस स्वरूप अगुरूलघुत्व शक्ति है। इन वृद्धि-हानिरूप कार्य के होने पर भी द्रव्य का स्वरूप तो हानिवृद्धि से हटकर एकरूप ही है - यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए। इसप्रकार यहाँ अगुरुलघुत्व की षट्स्थानपतित वृद्धि-हानिरूप से प्रवर्तमान स्वनिमित्तक उत्पाद का वर्णन हुआ। अब परप्रत्यय उत्पाद के विषय मे विचारते है। स्वर्णकार ने कड़े से कुंडल बनाए , यहाँ पर स्वर्णकार जोकि एक परद्रव्य है उसके निमित्त से जो कुण्डलरूप पर्याय का उत्पाद हुआ , वह परप्रत्यय अथवा परनिमित्तक उत्पाद है। अब व्यय को कहतें है - जब भी कोई पर्याय अपनी समयपर्यंत की मर्यादा को पूर्ण कर नाश को प्राप्त होती है , वह उस पर्याय का व्यय कहलाता है।